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ISSN 2292-9754

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06.04.2014


भाषा सीमाओं में और सीमाओं से परे - एक विचार

"किसी भी भाषा की अंतरआत्मा की पहचान उसकी साहित्यिक क्षमताओं से होती है। सोचना यह है कि यह साहित्यिक क्षमताएँ क्या हैं? ये कहाँ से उभरती हैं? कोई भी गद्य एवं पद्य की रचना जिसमें उच्च श्रेणी की कलात्मक योग्यता का आभास या प्रदर्शन हो वही उस भाषा का समाज में एक स्थान और स्तर स्थापित करता है जो निश्चल हो जाता है।

भाषा और संस्कृति सामान्य जीवन का एक आधारभूत तथ्य तो है, लेकिन जीवन की वह गहराई, वह बिंदु, जहाँ से साहित्यिक एवं सभी प्रकार की कलात्मक कल्पनाओं का जन्म होता है, वह मन मंदिर के गर्भगृह या अचेतन अवस्था में है, जो जीवन की सभी किस्म की विभिन्नताओं की केंद्र-भूमि भी है, जहाँ अनेकता को एकता का स्वरूप मिलता है। तो क्या हिंदी और विभिन्न भाषाओं और उन भाषाओँ का प्रचार करने वाली साहित्यिक संस्थाओं का सबसे पहला दायित्व यह नहीं हो जाता कि वे व्यक्ति-विशेष में उस कलात्मकता को इस प्रकार जागृत और बरक़रार करने में सहायक हों कि जिससे वह व्यक्ति-परक हो सके और उसका प्रभाव समकालीन साहित्य में उभर कर छलके। प्रवास में पनपते साहित्य के लिए तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि प्रवास, परिवर्तन और परिवर्तनशील समय के प्रति और भी अधिक संवेदनशील है और इस कारण यह साहित्य में नयापन लाने का एक अनुकूल अवसर भी प्रदान कर सकता है। इस सबके बीच भाषा के प्रचार और प्रसार की क्रिया में यह ज़रूरी है कि भाषा की रूह को जीवित रक्खा जाये यानी कि उसकी साहित्यिक क्षमताएँ जो कलात्मक योग्यता पर निर्भर हैं, उनमें एक निरंतर गतिशीलता बनी रहे जो उन्हें विकास की ओर ले जाये।

कलात्मकता के लिए यह स्वाभाविक है कि हम अपने जीवन के हर पहलू को अपनी रूह से महसूस कर पाएँ। समय आने पर इन महसूस किये हुए पलों का स्पर्श, जो मन की अनदेखी गहराइयों में कहीं लुप्त हो चुका था, अपनी अवचेतन मन:स्थिति से उभरती प्रतिभा से प्रभावित हो कर चेतन अवस्था में, बिम्ब और छवियों में परिणत होता हुआ, भाषा का आवरण पहन, उसमें खुदबखुद उतर सकता है। इस प्रकार का अनुभव भाषा को एक कलात्मक योग्यता देता हुआ उसके विकास का एक वाहन या कारण बन जाता है।

कोई भी अच्छा साहित्य अपने आप में एक नयापन लेकर आता है और यह नयापन नई सोच के साथ ही उभरता है। तो इसका अर्थ यह हुआ कि भाषा का सीधा सम्बन्ध हमारी सोच और व्यवहारिकता के साथ जुड़ा है और भाषा का अच्छा होना उसकी साहित्यिक क्षमताओं और कलात्मक योग्यताओं से जुड़ा है।

जब हम गतिशील विकास की बात करते हैं तो प्रश्न यह भी उठता है कि अभिव्यक्ति का भाषा से क्या सम्बन्ध है? इससे जुड़ा प्रश्न या भी है कि २१वीं शताब्दी के ग्लोबलाइज़ेशन और तेज़ रफ़्तार की टेक्नोलॉजिकल प्रगति के कारण जो बदलाव आ रहे हैं उनका मनुष्य की उन सूक्ष्म संवेदनाओं पर किस प्रकार का असर होगा जिनके कारण मनुष्य की सृजनात्मक क्षमताएँ उभरती हैं? इसके साथ ही इनकी अभिव्यक्ति का प्राथमिक माध्यम क्या होगा? कहीं साहित्यिक प्रणाली और भाषा एक नया रूप तो नहीं ले लेंगी जो प्रचलित प्रणाली और रूप से बहुत भिन्न होगा? उस भाषा या माध्यम का परिवेश क्या होगा जिसमें मनुष्य अपनी अव्यक्त और सूक्ष्म संवेदनाओं को ऊंचे स्तर पर कलात्मक रूप से अभिव्यक्त कर पायेगा?

इस तेज़ बदलाव के बीच क्या हिंदी और अन्य भाषाओँ का जो आज स्वरूप है वह बच भी पायेगा और अगर हाँ तो कब तक?

क्या हिंदी को एक नई दिशा देने की आव्यशकता है जो इस बदलाव में इसे एक नई पहचान दे सके? अगर हिंदी को अग्रसर होना है तो क्या इस नए वक़्त को गले से लगाकर व्यक्तिगत रूप से हमें भाषा की प्रचलित परिभाषा से परे नहीं जाना होगा? क्या यह समय में होते परिवर्तन की नितांत आवश्यकता नहीं है? बदलाव विवश कर रहा है कि मनुष्य विभिन्नताओं में जो कि भाषा, संस्कृति, सभ्यता, समाज, वर्ग, वर्ण और नई तकनीकी इत्यादि से उपजती हैं, उनके बीच एक केंद्रित बिन्दु ढूँढे, एक सामान्य प्ले ग्राउंड जहाँ आपस में मिलकर विचारों का आदान-प्रदान हो सके। आज के सन्दर्भ में अपने से भिन्न के साथ मिलकर आगे बढ़ना ही समय की पुकार है और यह चुनौतीपूर्ण भी है।

यह नहीं होगा तो क्या सब कुछ बिखर नहीं जाएगा? तो फिर भाषा कैसे बचेगी? देखा जाये तो इस वक़्त की रफ़्तार में हर जातीय भाषा की यही विडंबना है। जातीय भाषाओं को तो छोड़िये क्या इस बदलाव से अंग्रेज़ी भी बच पा रही है? बल्कि इस बदलाव का सबसे अधिक असर पारम्परिक अंग्रेज़ी पर ही पड़ा है और यहाँ तक की उसका इडियम और उपयोग निरंतर तेज़ी के साथ मौलिक रूप से परिवर्तनशील है।

बदलते समाज को और नई पीढ़ी को वो चाहिए जो तुरंत और अभी उनकी सूक्ष्म संवेदनाओं तक पहुँचे। जिसे वह एक नज़र में समझ पाएँ । यानी कि शक्तिशाली विज़ुअल, बिम्ब, चित्र, और उनके साथ सम्पूरक ध्वनि स्पंदन और साथ में थोड़े से प्रचलित भाषा के कुछ शब्द जो उनके मन मस्तिष्क को तत्क्षण सकारात्मक रूप से झिंझोड़ कर कुछ ठोस मायने दे सकें। ज़माना बहुक्रियात्मकता और रफ़्तार का है। इसलिए अगर हिंदी भाषा को आगे जाना है तो उसे भी SMS की फुर्ती पकड़नी होगी, भाषा के बंधन से मुक्त हो कर नए प्रयोगों और बदलते समाज की विभिन्नताओं को अपनाना होगा और इन विभिन्नताओं को अपनी अवचेतन प्रकृति में आश्रित होने कि क्रिया को सकारात्मक रूप से चेतन मन से समझाना होगा जिससे उसमे अभिव्यक्त हो रही सूक्ष्म संवेदनाओं को एक नई दिशा प्रदान करता हुआ एक नया साहित्यक माध्यम मिल सके और जिस कारण भाषा को एक नए मायने भी मिलें। शायद समय और बदलाव की यह हम सब को एक बड़ी चुनौती है लेकिन साथ ही साहित्यिक कलात्मकता के लिए एक बहुत बड़ा सुअवसर।"


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