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05.03.2012
 
अवशेष
मीना चोपड़ा

वक्त खण्डित था, युगों में
टूटती रस्सियों में बंध चुका था
अँधेरे इन रस्सियों को निगल रहे थे।

और तब !
जीवन तरंग में अविरत मैं
तुम्हारे कदमों में झुकी हुई
तुम्हीं में प्रवाहित
तुम्हीं में मिट रही थी
तुम्हीं में बन रही थी।

तुम्हीं में अस्त और उदित मैं
तुम्हीं में जल रही थी
तुम्हीं में बुझ रही थी।

कुछ खाँचे बच गए थे
कई कहानियाँ तैर रही थीं जिनमें।

उन्हीं में हमारी कहानी भी
अपना किनारा ढूँढती थी।

एक अंत!
जिसका आरम्भ दृष्टि और दृश्य से ओझल
भविष्य और भूत की धुन्ध में लिपटा
मद्धम सा दिखाई देता था।

अविरल!
शायद एक स्वप्न लोक!

और तब आँख खुल गई
हम अपनी तकदीरों में जग गए।

कई टुकड़े ज़मीं पर बिखर गए।

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