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04.28.2008
 

अस्मृति
मीना चोपड़ा


धूल थी
कपड़ों पर जमी
कितनी आसानी से
झड़ गई मैं
चेतना के हाथों
झटकने मात्र से
मिट्टी में भर गई मैं।

असहाय से गुनाहों
में गढ़ी उलझन बनकर
एक काले चिराग के
गहरे कुएँ में बंद
दम भरती हुई
अँधेरों को अँधेरों से
जोड़ती चली गई।

कहीं अच्छा होता –
सिर्फ़ कुछ समय के लिये
अचेतन में
चेतन का ईंधन रख
एक छोटा सा जुगनू
सुलगा देते तुम –
हलका सा मुझको
अपने में जला लेते तुम
मीठी सी नींद में मुझको
सुला देते तुम

अचिर ही सही –
कुछ तो बिसात होती
कहीं कोई आस –
चाहे मिट्टी के साथ होती।


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