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05.03.2012
 
अंतरंग
मीना चोपड़ा


तुमसे मिली धूप
तुम्हीं को अर्पित कर दी मैंने।

सुबह की कोख से उदित होकर
यह आसमानों में डबडबाई थी।

बूँद बूँद टपकी
सिलेटी अँधेरों में।

एक मद्धम सी रोशनी
बिखर गई थी।
कहती थी कुछ हमसे
जो हम सुन ही न सके।

किसी चुप सी अमावस को
कभी मुड़कर
बंद दरवाज़ों के पीछे छुपे अँधेरों को
टटोल पाए अगर
तो शायद छू सकें
उस टपकते नूर के कुछ
अमुल्य सुनहरे मोती।

कुछ छिटक के गिर गए थे इधर-उधर
जो समेट के रख लिये थे
मैंने पास अपने।
सदियों तक जीने के लिये शायद काफी हों।

छोटी सी पूँजी है
न तो घटती है न ही टूटती है क्भी।
हो सके तो इसमें से कुछ
तुम भी रख लो।
जीवन का मोल और कुछ भी नहीं
अंतरंग आगे इसके और कुछ भी नहीं।

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