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06.07.2008
 

अनमोल
मीना चोपड़ा


मदमस्त सुबह
लहरों में घुलती
मचलती ठंडी हवा
सनन-सनन स्मृतियाँ।

हीरे मोती जड़े
सुनहरे पंख पहन
ऊँची उड़ानें भरती
झिलमिल स्मृतियाँ।

सुबह की ठंडक में डोलता
स्वप्न लोक का झूला
स्मृतियों को पींगों में पनाह देता
जैसे कोई सुबह का भूला।

अतीत में भीगे वक़्त के
बदलते चोलों में पलती स्मृतियाँ
आज रूबरू खड़ी हैं
सदृश्य आँखों में भरी हैं।

गुपचुप अनजान आवाज़ों में
जगी हुई ये अनमोल स्मृतियाँ।

अँधेरों में इन्हें
मैं डुबो नहीं सकती
कालिख से रंगों को इन्हें
भिगो नहीं सकती
मूँद कर आँखें
ओढ़कर कफ़न काले
मैं सो नहीं सकती।

मुआफ़ करना अंतरंग मेरे
अपनी स्याही की उजली सुबह
के मोती
मौत को सूँघती
कच्ची नींद के धागों में
पिरो नहीं सकती।

दफ़न हो नहीं सकती।


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