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04.24.2008
 

अबद्ध
मीना चोपड़ा


समय
बहता हुआ
काश
बन्द हो पाता
मेरी मुट्ठी में
और शुरूआत होती
एक जीत की,
क्या असंभव है?

उँगलियाँ जो बाँधती
लकीरों को एक मुट्ठी में
ढीली पड़ने लगती
और
उन झरीठों से
कुछ क्षण
गिरने लगते
फैलने के लिये
अनन्त शून्य की
अनदेखी दिशाओं में —

कौन से धागे होंगे
जो इन्हें
रेखाओं में फिर
बाँध पाएँगे?

उन्हीं को खोजती हूँ
शायद तुम्हारे पहलू में।


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