अबद्ध मीना चोपड़ा
समय बहता हुआ काश बन्द हो पाता मेरी मुट्ठी में और शुरूआत होती एक जीत की, क्या असंभव है?
उँगलियाँ जो बाँधती लकीरों को एक मुट्ठी में ढीली पड़ने लगती और उन झरीठों से कुछ क्षण गिरने लगते फैलने के लिये अनन्त शून्य की अनदेखी दिशाओं में —
कौन से धागे होंगे जो इन्हें रेखाओं में फिर बाँध पाएँगे?
उन्हीं को खोजती हूँ शायद तुम्हारे पहलू में।