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| 04.30.2008 |
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आवर्तन |
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टेढ़े और तिरछे रास्तों फिर देखा ज़हन में भर चुके थे टुकड़े। वक़्त में जमी और रुकी ये चापें सिर्फ़ पत्थर ही पत्थर आँखें चुभती हैं दबी दबी लावा बनकर |
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