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ISSN 2292-9754

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02.05.2017


शोध प्रविधि का व्यावहारिक महत्व कालिदास के नाटकों के विशेष संदर्भ में

शोध (अनुसंधान) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कल्पना व तर्क का समावेश होता है, अर्थात् अनुसंधाता अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति व रुचि के कारण नवीन व प्राचीन उपकरणों का सहारा लेकर तथ्यों का संकलन करता है, और इस तरह अपनी कल्पना को मूर्त रूप देता है। जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण ही शोध संभव है, मनुष्य जिज्ञासु प्राणी है, उसके जानने की तीव्र इच्छा ने ही नित नये अविष्कार को जन्म दिया है। वर्तमान समय में देश-दुनिया के तमाम क्रियाकलाप तत्काल हो जाते है, यह शोध (खोज) का ही कमाल है। शोध का कोई न कोई विषय व उद्देश्य होता है जिस तरह कोई भी कार्य के पीछे उद्देश्य व विषय होता है, उद्देश्य विहीन कार्य में सफलता असंभव है। समस्या (विषय) एक प्रश्नवाचक वाक्य होता है, किसी भी प्रकार के शोध की वास्तविक उपयोगिता तभी है जब वह व्यावहारिक रुप में उपयोग में आए उसका समाज को लाभ मिले। शोध या अनुसंधान को अंग्रेज़ी में रिसर्च कहते हैं, Re-search पुनः खोज। रिसर्च के लिए हिन्दी में अनुसंधान, अन्वेषण खोज, शोध आदि षब्द है। इस प्रकार अनुसंधान अनु का अर्थ-पीछे और संधान का अर्थ दिशा विशेष में प्रवृत्त करना या होना अनुसंधान का पूर्ण अर्थ किसी लक्ष्य को सामने रख दिशा विशेष में आगे बढ़ना।

शोध में प्राप्त सामाग्री को शुद्ध करना उसका संस्कार-परिष्कार करना आता है। साहित्यिक विषयों में अनुसंधान में विचार का अधिक महत्व होता है। मौलिकता अनुसंधान का प्राणतत्व होता है, कालिदास के रचनाओं में उनकी मौलिकता स्पष्ट नज़र आती है। अनुसंधान में तत्वों के सम्बन्ध ज्ञान का महत्व होता है। शोध में व्याख्या का भी बहुत महत्व है व्याख्या करने से विषय में समाहित अर्थ स्पष्ट हो जाता है। शोध में आख्यान व्याख्या का बहुत महत्व है। "आख्यान का अर्थ है व्याख्या करना स्पष्टीकरण करना, निहित अर्थ को विहित करना तथ्य अथवा तथ्यों के आख्यान का अर्थ है उनके पारस्परिक सम्बन्धो को व्यक्त करना। दूसरें शब्दों में तथ्यों को विचार में परिणत करना नवोपलब्ध तथ्य का आख्यान पूर्वोंपलब्ध तथ्य का पुनःराख्यान होता है। साधारणतः सभी प्रकार के अनुसंधान कार्य के लिए और विशेषतः साहित्यिक अनुसंधान कार्य के लिए आख्यान अथवा पुनराख्यान का अनिवार्य महत्व है क्योंकि तथ्य अपने आप में इतना महत्वपूर्ण नहीं है, वास्तविक महत्व तो उनके पारस्परिक सम्बन्ध ज्ञान है।"1

साहित्य का तात्पर्य स+ हित = अर्थात् सबका हित साहित्य वह है जिसमें सबकी भावनाएँ सबका हित समाहित हो इस प्रकार देखते हैं कि शोध प्रविधि के अंतर्गत साहित्य का समावेश या शोध प्रविधि का साहित्य से सामंजस्य शोध के प्रत्येक चरण साहित्यकार की विधाओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है। कालिदास की नाट्यकृति में भी शोध के प्रत्येक चरण नज़र आते हैं जिनका एक अनुसंधाता की तरह उन्होंने उसका उपयोग किया है। विक्रमोर्वषीय, अभिज्ञान शाकुन्तल आदि नाट्यकृतियाँ को उदाहरण के रूप में लिया जा रहा है। साहित्यकार का मुख्यध्येय होता है, कि वह अपनी कृतियों के माध्यम से समाज को श्रेयस्कर प्रदान करता है। "साहित्य के क्षेत्र में तो यह बात और भी अधिक घटित होती है, क्योंकि साहित्य ज्ञान के सूक्ष्मतर माध्यमों में से है। अतएव साहित्य के क्षेत्र में तो वस्तु अथवा तथ्य का स्वतंत्र महत्व और भी कम तथा ज्ञान अर्थात् विचार एवं भाव का महत्व और भी अधिक है। यहाँ तो अन्वेषण का भाव तथ्यात्मक न होकर विचारात्मक होना चाहिए आख्यान तो उसकी पहली आवश्यकता है। यह आख्यान जितना मूलवर्ती और सूक्ष्म गहन होगा, अनुसंधान उतना ही मूल्यवान होगा।"2

शोध प्रविधि के अंतर्गत अनुसंधाता का दृष्टिकोण शुद्ध वस्तुपरक होना चाहिए। शोध में आत्मगत अथवा भावगत तथ्यों का कोई स्थान नहीं होता है। अनुसंधाता की दृष्टि तटस्थ होनी चाहिए। शोधार्थी को अपने शोधकार्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। "वस्तुपरक अथवा तथ्यपरक दृष्टिकोण का अर्थ यह है कि दृष्टा या समीक्षक वस्तु अथवा तथ्य पर अपनी दृष्टि केन्द्रित रखता है, वह वस्तु या तथ्य को उसके अपने रूप में ही देखता और प्रस्तुत करता है, उस पर अपनी भावना का आरोप नहीं करता, उसमें अपने भावों या विचारों का रंग नहीं देता। वस्तुपरक समीक्षक केवल उसी को ग्रहण करता है जो उसे तथ्यों से प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होता है, वह अपनी कल्पना को तथ्यों का प्रसव नहीं करने देता। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। निर्मुक्त दृष्टि से जगत का यर्थाथ दर्शन करना विज्ञान का लक्ष्य है, विज्ञान के लिए जगत अथवा प्रकृति या पदार्थ ही मुख्य है, आत्मा नहीं।"3

महाकवि कालिदास के नाटकों की बात करें तो हम देखते है कि कालिदास के नाटक सुखान्त है। इनका विषय शृंगारिक प्रणय की प्रस्तुति है। इन नाटकों में जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल विक्रमोर्वषीय या मालविविकाग्निमित्र में प्रणय (प्रेम) की कथावस्तु रखी है। इसमें नायक-नायिका के प्रेम सम्बन्धों व उनके संवादों पर कथा टिकी है, इनके नाटकों में नाटकीयता स्पष्ट नज़र आती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि "महाकवि कालिदास की नाट्य रचना के रूप में तीन नाटक उपलब्ध होते हैं- मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वषीय तथा अभिज्ञानशाकुन्तल। साहित्य समालोचकों की ऐसी मान्यता है कि महाकवि कालिदास की नाट्यकला मालविकाग्निमित्र के रूप में अंकुरित हुई विक्रमोर्वषीय के रूप में पल्लवित एवं पुष्पपित हुई। तथा अभिज्ञानशाकुन्तल के रूप में फलीभूत हुई। इस प्रकार कालिदास की नाट्यकला के तीन रूप उनके इन तीन नाटकों में देखने को मिलते हैं।"4

महाकाव्यों की रचना करने के कारण कालिदास महाकवि कहलाएँ, किन्तु वे एक सफल नाटककार भी कहलाए थे। कालिदास की कृतियाँ संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इन्होंने अपनी कल्पना की उपज से संस्कृत साहित्य को नई दिशा प्रदान की है। इस विषय में भोलाशंकर व्यास कहते हैं- "कालिदास को कई आलोचक प्रमुखतः कवि मानते हैं, नाटककार नहीं। किन्तु यह मत भ्रान्त प्रतीत होता है। विक्रमोर्वषीय तथा अभिज्ञानशाकुन्तल की कथावस्तु का विनियोग इस बात का प्रमाण है कि कालिदास कवि ही नहीं अपितु जीवन के गत्यात्मक चित्र का नाट्कीय निर्वाह करने में भी उतने ही कुशल है।"5

कालिदास संस्कृत साहित्य हो या विश्व साहित्य में जाना पहचाना नाम है, कालिदास के नाटकों की कथावस्तु प्रेरक व सर्वजन हिताय का सूचक है। महान नाटककार कालिदास ने सर्वप्रथम अभिज्ञानशाकुन्तल मालविकाग्निमित्र व विक्रमोर्वषीय का विषय (समस्या) का चयन किया। जिसमें दुष्यंत व शकुन्तला मालविका व अग्निमित्र, उर्वशी व पुरनवा को कथा का आधार बनाया और इस तरह परिकल्पना का निर्माण, कथावस्तु को आगे बढ़ाने के लिए तथ्यों का संकलन, विश्लेषण व व्याख्या कर निष्कर्षों की प्राप्ति कर अपनी खोजी प्रवृत्ति व कल्पनाशीलता का संयोजन कर उद्देश्य की प्राप्ति करते है। समस्या (विषय) का समाधान खोजना और उसे वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचाना जिससे भावी पीढ़ी के लिए नये मार्ग खुलें। कालिदास ने अपनी नाट्यकृतियों के माध्यम से जनमानस को अपने जीवन को बेहतर बनाने की कला सिखाई है, ‘मालविकाग्निमित्र’ कालिदास की पहली नाट्य रचना है, इसमें राजा अग्निमित्र व मालविका की प्रणय कथा है। विक्रमोर्वषीय कालिदास की दूसरी नाट्यकृति है इसमें नायक-नायिका मानवी एवं दैवी कोटी के मिलते है इसमें कुल पाँच अंक है, शास्त्रीय शब्दावली में इसे त्रोटक भी कहा जाता है। शाकुन्तल में दुष्यंत व शकुन्तला की प्रेम कहानी को विषय (समस्या) के रूप में लिया गया है। श्लोक दृष्टव्य है-

"मधुरस्वरा पर भृता भ्रमरी च विबुद्धचूतसग्डिन्यौ।
कोटरमकालवृष्टया प्रबल पुरोवा तथा गमिते॥"6

कालिदास की अभिज्ञानशाकुन्तल सर्वोकृष्ट कृति है। महाकवि कालिदास ने अपने नाटकों में शोध के चरणों व शोध रूपरेखा के अनुसार प्रस्तावना विधि, प्रविधि उद्देश्य संभावनाएँ ये सारी चीज़ें नज़र आती है। कालिदास के नाटकों में विक्रमोर्वषीय और अभिज्ञानशाकुन्तल की कथाएँ पुराण और इतिहास से ली गई है।

परिकल्पना शोध में बहुत महत्वपूर्ण होती है परिकल्पना समस्या के समाधान का मार्ग सूझाती है, प्रायः समाज में अथवा परिवार में कन्या की विदाई होती है यह कारूणिक प्रसंग है, यह सर्वविदित है। इस संदर्भ में महर्षि कण्व यह अनुमान या परिकल्पना करते हैं कि शकुन्तला की विदाई के दृश्य को देखकर महर्षि कण्व सोचते हैं कि सन्यासी जीवन यापन करके जब वह अपनी कन्या को विदा कर रहे हैं और जैसी व्यथा हो रही है शकुन्तला पति के घर जा रही है। जब वनवासियों की यह दशा है, तो गृहस्थों की क्या दशा होगी?

"यास्यत्पद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्ट मुतक्ण्ठया
कण्ठः स्तम्भितवाष्यकृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम ता वदी दृशमिंद् स्नेहादरण्योंकसः
पीडयन्ते गृहिणः कथं नु तनया विश्लेषदुः खैर्नवै॥"7

वास्तविक सत्य की पहचान अंतकरण से होती है। संदेह की स्थिति में भी भीतरी प्रेरणाएँ पथभ्रष्ट नहीं करती अंतकरण प्रवृत्तियाँ सदैव सटीक होती है, दुष्यंत का भी यही विश्वास था। कार्य की सत्यता का आधार आपका मन या अंतकरण होता है।

"असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यभस्यामभिलाषि में मनः।
सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमतः करण प्रवृत्तयः॥"8

समस्या आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा है, समस्या है तो उसका समाधान भी आवश्यक है। प्रयोगात्मक शोध में प्रयोग से किसी चीज़ को सामने लाते हैं। पुरूरवा की स्थिति का वर्णन है, उसका मन उर्वशी के आकर्षण व प्रेम में व्याकुल है। वह कहता है कि मोहिनी के प्रेम जाल में मुझे उपवन की फूली लताएँ पसंद नहीं आ रही, कुछ ऐसा उपाय कि सोचों मेरे मन की समस्या का समाधान हो जाए।

"मम कुसुमितास्वपि सखे नोपवनलतासुनभ्रविटपासु
चक्षुर्वध्नाति धृतिं तद्रपालोक दुर्ललितम्।
तदुपाय श्चिन्त्यातां यथा सफल प्रार्थनों भवयम्॥"9

शोध में हो या साहित्य में किसी विषय के प्रति इच्छा अध्ययन से आरंभ में ही जागृत हो जाती है। शोध में निर्देशक के माध्यम से या स्वयं की रुचि से विषय का चयन किया जाता है। विषय (समस्या) चयन के पश्चात् शिक्षक एक कलाकार की भाँति उत्तम शिष्य के पास पहुँचकर उसकी क्षमता व योग्यता का आकलन कर स्वयं भी प्रकाशित होता है गुरू-शिष्य का सम्बन्ध समुद्र की सीपी में मोती जैसा है, क्योंकि बादल का जल समुद्र की सीपी में पहुँचकर मोती जैसा बन जाता है।

"पात्रविशेषे न्यंस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः।
जलमिव समुद्रशुम्तौं मुक्ताफलतां पयोदस्य॥"10

मनुष्य विवेकशील प्राणी है, वह अपने विवेक से ही अच्छे बुरे का भेद करता है। ग्रहण योग्य वस्तुओं का उपभोग करता और अन्य को परे रखता है। मालविकाग्निमित्र के एक श्लोक में यह बताया गया है कि कोई वस्तु पुरानी है तो वह अच्छी है, और नई होने से उन्हें हेय की दृष्टि से देखना गलत है, विवेकशील प्राणी तो अपनी बुद्धि से नई व पुरानी को ग्रहण करता है एक शिक्षक का भी यही कार्य होता है कि प्राचीनता व नवीनता का संयोजन करें। शोधार्थी यह सोचता है कि पुरानी पद्धति में इतिहास का समावेश था, वह अच्छी है और आज इतिहास पक्ष को शोध से परे रखा गया है। इसलिए वह गलत है, ऐसा मानना उचित नहीं है।

"पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः पीरक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढ़ पर प्रत्ययनेय बुद्धि॥"11

शोध में सामाग्री संकलन एक महत्वपूर्ण चरण है। मन में परिकल्पना या पूर्व अनुमान से ही नवीनता व मौलिकता सामने आती है। अनुसंधाता अपने कौशल से तथ्यों का संकलन कर उसे चित्त में स्थापित कर नवीन स्वरूप प्रदान करता है। शकुन्तला के षरीर कीे अपने रचना कौशल से विधाता ने सृष्टि की है। इस संदर्भ में श्लोक दृष्टव्य है-

"चित्ते निवेश्य परिकल्पित सत्वयोगा
रूपोच्चयेन मनसा विधिज्ञा कृता नु।
स्त्रीरत्न सृष्टि प्रतिभाति सा में
धातुविभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्र तस्याः॥"12

महाकवि कालिदास को भारत का षेक्सपीयर कहा जाता है, कालिदास के नाटकों में प्रेम व प्रकृति चित्रण स्पष्ट रूप दृष्टिगोचर होता है। कालिदास ने अपनी कल्पनाशीलता से जनमानस को ऐसी अनुपम कृतियाँ उपहार स्वरूप प्रदान की है, जो संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर है। शोध की प्रवृत्ति प्रत्येक मानव में स्वाभाविक है, जब साहित्य का शोध से से सम्बन्ध होता है तो वह परिश्कार का रूप ले जाता है। निश्कर्शतः कालिदास साहित्य में शोध के प्रत्येक चरण भिन्न-भिन्न रूपों में दृष्टिगत होते है। एक साहित्यकार अपनी लेखनी से जो कुछ रचता है वह उनका शोध ही है। जैसे- अभिज्ञानशाकुन्तल में दुर्वासा की कल्पना कालिदास की मौलिकता है।

विश्व में कुछ सत्य या कटु सत्य विद्यमान है उन सत्यों को आधार बनाकर साहित्यिकों अथवा शोधकर्ता ने अनुसंधान का प्रयास किया। इस संदर्भ में महाकवि कालीदास श्रेश्ठ शोधकर्ता के रूप में अग्रणी है। यथा परस्पर विरोधी तत्वों का एक साथ होना मुश्किल है, किन्तु कही-कही पर चुम्बकत्व या चुम्बक का कार्य दो विरोधी तत्वों का समाहित कर लेता है। इसी प्रकार कालीदास जी का कथन विक्रमोवर्शीय के अंतिम श्लोक में दृष्टिगोचर होता है-

परस्पर विरोधिन्यो रेक षंशय दुर्लभम्।
संगतम् श्री सरस्वत्योः इत्यादि॥

शोध के माध्यम से परस्पर विरोधी तत्वों के मध्य भी सम्बन्ध स्थापित होता है। वास्तव में कालिदास की कृतियों में दुष्यंत, षंकुन्तला, पुरूरवा, उर्वशी, मालविका, अग्निमित्र आदि ने जीवन के उतार-चढ़ाव को व्यावहारिक रूप से आत्मसात कर संयम, ईमानदारी व संतुलन स्थापित किया तथा समस्याओं का समाधान कर अपने जीवन को बेहतर बनाया।

संदर्भ:-

1. नगेन्द्र डॉ., शोध और सिद्धांत, पृष्ठ 6, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस नई दिल्ली
2. वही पृष्ठ 7
3. वही पृष्ठ 8
4. साहू डॉ. रामदेव, संस्कृत का इतिहास, पृष्ठ 151, श्याम प्रकाशन जयपुर, द्वितीय संस्करण 2004
5. वहीं पृष्ठ 151
6. तिवारी डॉ. रामशंकर, महाकवि कालिदास, पृष्ठ 262, चौखम्भा सुरभारती प्रकाशन वाराणसी, चतुर्थ संस्करण 1980
7. वही पृष्ठ 171
8. वही पृष्ठ 197
9. वही पृष्ठ 233
10. वही पृष्ठ 253
11. वही पृष्ठ 252
12. वही पृष्ठ 280

शोधार्थी
श्रीमती मेधाविनी तुरे
हिन्दी-विभाग
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़, जिला-राजनांदगांव (छ.ग.)


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