अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.13.2017


सुबह के पटाखे

टीवी पर संदेश आ रहा था, दिवाली पर पटाखे कम जलाएँ वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और साथ ही ध्वनि-प्रदूषण भी, पटाखों की तेज़ आवाज़ से बच्चे-बूढ़े, पशु-पक्षी सब परेशान हो रहे हैं, ऑफिस जाने का समय हो रहा था जल्दी से तैयार हो कर मैं ऑफिस के लिए निकल गया।

दिशांत ने कल रात ही मेरे पास चुपके से अपनी माँग रखी थी मिर्ची पटाखा ला देने की पर मनु, मेरी पत्नी ने पहले ही मना कर रखा था जिसमें ख़तरा हो वो पटाखे मत लाइएगा। मनु का मना करना ग़लत नहीं था, एक माँ होने के नाते बिल्कुल सही थी वह। कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों को मनमानियाँ करने से सिर्फ़ इसलिए रोकते हैं ताकि वो अंजान मुसीबतों से बचे रहें। परंतु पत्नी के मना करने पर भी मैं आज हर तरह के पटाखे लाने वाला था, पर ज़्यादा ख़तरों या तेज़ आवाज़ वाला नहीं।

ऐसा करने के पीछे सिर्फ़ एक ही कारण था, मेरे बचपन की दिवाली जो मुझे आज भी याद आ जाती है। दिवाली रात की ठीक अगली सुबह हमारे दोस्तों की फौज जिसमें मैं, मेरे दोनों भाई विजय और नवीन, पीटर, शौक़त, लालू, राजू इकट्ठा हो कर निकल जाते थे अधजले पटाखों की तलाश में। हर कोई चाहता था के वो सबसे ज़्यादा पटाखे ढूँढ सके, हम पूछते और बताते भी रहते थे के किसके कितने हुये। एक लालच कि मुझसे ज़्यादा किसी का ना हो और फिर उस लालच को पूरा करने का एक जुनून कि सबसे ज़्यादा मैं ही ढूँढूँ और फिर एक डर कि जिसका ज़्यादा होगा उसे तो कम वालों को बाँटना होगा और फिर ना बाँटनें की एक चंचल मौन स्वीकृति बड़ी ख़ामोशी से, कोई विद्रोह नहीं। क्योंकि चुन लेने के बाद कोई साथ रहने वाला नहीं था, सब भाग जाते थे। हम हर गलियों में घूमते, लाल और सफ़ेद जले हुये पटाखों के काग़ज़ों के बीच हमें सिर्फ़ लाल की तलाश रहती थी, सिर मिर्ची पटाखा, जो दिखने में बिलकुल लाल होता था। एक पूरा का पूरा लाल मिर्ची पटाखा मिलने से मन के अंदर एक हरियाली सी आ जाती थी और अगर ग़लती से किसी को अध जला अनार या बम मिल जाए तो उसके लिए तो फिर बड़ी दीवाली। फिर हम एक दूसरे से आग्रह करते के देख तुझे एक अनार मिला, अगली बार मुझे लेने देना।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो अफ़सोस होता है और मैं नहीं चाहता कि मेरा दिशांत जब बड़ा हो जाए वो भी अफ़सोस करे। इसलिए शाम को मैंने ढेर सारे पटाखे खरीदे, रात को हमने सब मिल कर जलाये, बीच-बीच में मेरी नज़रें कुछ तलाशती रहती थी, अपने जैसी उस फौज को जो रात में ही बँट जाया करते थे। अलग-अलग जगहों पर कि किन-किन गलियों में ज़्यादा पटाखे जलते-जलते बुझ गये, सुबह उन जगहों पर जल्दी धावा बोलेंगें, पर दिवाली की जगमगाती दीयों की रोशनी में भी वो दिखाई नहीं दे रहे थे। हम लोगों ने खाना खाया और सोने चले गए। मुझे नींद नहीं आ रही थी मैं सोच रहा था शायद वक़्त बदल गया है, अब किसी को सुबह के पटाखे का इंतज़ार नहीं रहता है, ये सब सोचते-सोचते नींद आ गई।

सुबह पत्नी की आवाज़ से नींद खुली, “उठिये पानी आ रहा है, आज आप भर लीजिये, मुझे बहुत काम है।“

मैं नींद में ही बोला, “वैसे भी तो रोज़ मैं ही भरता हूँ,” ये कहते हुये मैं पानी भरने बाहर आ गया।

बाहर कुछ दीये अब भी जल रहे थे, भगवान की लीला अद्भुत है जो दीये रात को इतने सुंदर लग रहे थे, सुबह वही फीके लग रहे थे। तभी मैं ठिठका, मैंने देखा बहुत से बच्चे झाड़ू लगा रहे थे। पूछने पे पता चला के उन लोगों को स्कूल में होमवर्क मिला है, अपने आसपास पटाखों के जलने से जो सारे कचरे हुये होंगे उसको साफ करने का। स्कूल की इस अनोखी पहल और बच्चों की निष्ठा को देख के अच्छा लगा। तभी कुछ बच्चे और दिखे जो उन कचरों के ढेरों को इकट्ठा कर उसमें से कुछ ढूँढ रहे थे। वो हमारी कॉलोनी के बच्चे नहीं थे। उनके शरीर पर दिवाली के नए कपड़े नहीं थे पर प्रसन्नता बहुत थी। उनकी आँखें बता रहीं थीं कि सुबह के इंतज़ार में वो सारी रात सोये नहीं हैं। मैं समझ गया, मेरे चेहरे पे मुस्कान तैर गई। निश्चित तौर पर वो बच्चे अपना होमवर्क नहीं कर रहे थे। मेरा बचपन मेरे सामने था। मैं ग़लत था, वक़्त अब भी नहीं बदला था। सुबह के पटाखों की तलाश अब भी जारी थी, पर एक उपदेश के साथ वो ये कि जहाँ हम जैसे लोग जो टीवी के सामने बैठ कर सिर्फ़ साफ़-सफ़ाई की बातें करते हैं वहीं कोई अपनी मासूम ज़रूरतों को पूरा करने के लिए के लिए इसे चरितार्थ कर रहा था।

मुझसे रहा नहीं गया, दौड़ के गया और रात के बचे हुये सारे पटाखे ले आया और उन बच्चों के बीच बाँट दिए। काफ़ी ख़ुश हुए सब, उनकी ख़ुशियाँ देख के मैं मन ही मन ख़ुद से एक प्रण कर रहा था कि अगली दिवाली से कुछ पटाखे मैं इन जैसे बच्चों के लिए भी ख़रीदा करूँगा। मैं भी झाड़ू ले कर सारे कूड़ों को इकट्ठा करने लगा और अधजले पटाखे ढूँढ-ढूँढ के बच्चों को देने लगा। मुझे ऐसा एहसास हो रहा था के जैसे मानों मैंने सुबह-सुबह अधजला सा अनार या कोई बम पा लिया हो। एक अजब संतुष्टि मिल रही थी। मनु मुस्कुराते हुये ये सब देख रही थी, पर मुझे जो आनंद मिल रहा था इसका अंदाज़ा शायद उसे नहीं था। सूरज निकल आया था, उसकी रोशनी दीयों की रोशनी को चुनौती दे रही थी। मैं सारे कूड़े को एक जगह इकट्ठा कर के जलाने लगा। बच्चे सुबह के पटाखे चुन कर जा चुके थे, दिशांत अब भी सो रहा था।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें