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ISSN 2292-9754

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02.02.2018


चाय की दुकान

चाय की दुकान जहाँ दुनिया से जुड़ी हर ख़बरें मिल जाएँगी आपको, भले हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहाँ कोई भी ख़बर सिर्फ़ उँगलियों को घुमाने से मिल जाती है पर उससे भी तेज़ ख़बर मिलेगी आपको चाय की दुकान पर। किसके बेटे ने मूँछें मुंडवा ली, किसकी बीवी झगड़ कर मायके चली गई, किसके घर में क्या पका है, किसकी बकरी दूसरे का खेत चर गई, हर तरह की ख़बरें बग़ैर किसी शुल्क के, न कोई इंटरनेट और न ही कोई टीवी या रेडियो, पर ख़बरें बिल्कुल टीवी के जैसे ही मसालेदार। सबसे मज़ेदार बात ये है कि वहाँ पर पुरानी-पुरानी ख़बरें सुनाने वाले भी आपको हमेशा मिल जाएँगें, भले ही वो आपके जन्म से पहले की क्यों न हों जैसे की वो मेमोरी कार्ड में सेव हैं। इन्हीं ख़बरीलालों में से एक हैं हमारे बादो चाचा, उनके पास तो समय ही समय है। कोई भी घटना वो ऐसे सुनाते हैं मानों वो आँखों देखी बता रहे हों। गाँव के हर गली-नुक्कड़, चौक-चौराहे पर मिल जाएँगें आपको। आप उनसे इस नुक्कड़ पर मिल कर जाएँ और अगली नुककड़ पर आपसे पहले वो पहुँचे रहते हैं, वो किस रास्ते से जाते हैं आजतक कोई जान नहीं पाया। मैंने जब से होश सँभाला है तब से उन्हें वैसा का वैसा ही देख रहा हूँ, बाल तो उनके बीस साल पहले ही पक चुके थे पर उनके शारीरिक बनावट में आज भी कोई बदलाव या बुढ़ापेपन की झलक नहीं दिखती है, मानों उनके लिए समय रुक गया हो, कोई कह नहीं सकता कि ये नाती-पोते वाले हैं।

सुबह-सुबह रघु चाचा की चाय की दुकान पर चाय प्रेमियों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया, ये ठीक उसी तरह होता है जिस तरह शहर के रैस्टौरेंट में, वहाँ व्यंजन पसंद करने में कम से कम आधा घंटा लगता है, ऑर्डर को सर्व होने में कम से कम आधा घंटा लगेगा ये तो मेन्यु कार्ड में ख़ुद लिखा होता है और फिर उसके बाद कोई समय सीमा नहीं; आप जब तक खाएँ और जब तक बैठें आपकी मर्ज़ी, खाएँ या न खाएँ सेल्फ़ी लेकर लोगों को बताएँ ज़रूर कि “सोनू विद मोनू एण्ड थर्टी फाइव अदर्स एट ओस्मानी रैस्टौरेंट”। यहाँ भी कुछ ऐसा ही दृश्य रहता है, पाँच रुपये की चाय पीकर लोग साढ़े तीन रुपये का अख़बार पढ़ते हैं और फिर देश-दुनिया के साथ पूरे गाँव और आस-पास के गाँव की कहानियाँ चलती हैं बग़ैर किसी समय सीमा के, सबको पता होता है घर के बुज़ुर्ग चाय की दुकान पर मिल जाएँगें विद अदर्स।

हमेशा की तरह बादो चाचा की आकाशवाणी जारी थी, “ये हरी को भी क्या हो गया है, बड़ी-बड़ी बच्चियों को पढ़ने के लिए ट्रेन से भेजता है, ये अभी साईकिल से स्टेशन जाएगी और फिर वहाँ से लड़कों की तरह ट्रेन पकड़ कर बाज़ार, पढ़ के क्या करेगी, कलक्टर बनेगी क्या? कुछ तो गाँव के मान-मर्यादा का ख़्याल रखता। मैट्रिक कर ली, अब कोई आसान सा विषय देकर घर से पढ़ा लेता।“ इसी के साथ शुरू हो गया गरमा-गरम चाय के साथ ताज़े विषय पर परिचर्चा, सब लोगों ने एक साथ हरी चाचा पर कटाक्ष करने में भाग लिया, कोई कहता ख़ुद तो अंगूठा छाप है, अब चला है भैया बेटियों को पढ़ाने, तो कोई कहता पढ़ कर वही चूल्हा-चौका ही सँभालेगी, इन्दिरा गाँधी थोड़े ना बन जाएगी।

अगले दिन बादो चाचा चाय की दुकान पर नहीं दिखे, पता चला कि पोती को जो स्कूल मे सरकारी साईकिल के पैसे मिलने वाले हैं उसी की रसीद लाने गए हैं। मुझे कल हरी चाचा पर किया गया कटाक्ष याद आ गया। जब मैं बचपन में साईकिल चलाना सीखता था तो उस समय मेरी ही उम्र की कुछ लड़कियाँ भी साईकिल चलाना सीखती थीं और यही बादो चाचा और गाँव के कुछ बुज़ुर्ग उन पर कटाक्ष करते नहीं थकते थे और आज अपनी ही पोती के लिए साईकिल के पैसे के लिए रदीद लाने गए हैं।

अगले दिन मैंने पूछा, “कल आप आए नहीं बादो चाचा?”

वो कहने लगे, “क्या बताऊँ बेटा! जगमला, मेरी पोती है ना, वो नवीं में चली गई है, उसी को साईकिल मिलने वाला है, उसी की रसीद लाने गया था। परेशान हो गया बेटा, कोई साईकिल का दुकानदार रसीद देने को तैयार ही नहीं था, सब को कमीशन चाहिए। पहले ही चेक मिल जाए तो इतनी परेशानी ना हो। ये सरकार भी ना, पहले रसीद स्कूल में जमा करो फिर जा कर आपको चेक मिलेगा, जब साईकिल के पैसे देने ही हैं तो दे दो, रसीद क्यूँ माँगते हो, उन पैसों का कोई भोज थोड़े ना कर लेगा, साईकिल ही लाएगा, आज कल के बच्चे-बच्चियों को भी पता है सरकार उन्हें पैसे देती है वो खरीदवा कर के ही दम लेते हैं, चैन से थोड़े न रहने देते हैं।“

“हाँ चाचा! पर जगमला तो लड़की है, वो साईकिल चलाये ये शोभा थोड़े न देगा!” मैंने व्यंग्य किया।

“अरे नहीं बेटा, हाई स्कूल बहुत दूर है, नन्ही सी जान कितना पैदल चलेगी, स्कूल-ट्यूशन सब करना पड़ता है, साईकिल रहने से थोड़ी आसानी होगी और देखो आज कल ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया, पढ़ेगी नहीं तो, अच्छे रिश्ते भी नहीं मिलेंगें।“

“पर आप ही तो कल हरी चाचा के बेटी के बारे में कह रहे थे, पढ़ के कलेक्टर बनेगी क्या?” मैंने फिर व्यंग्य किया।

इस बार चाचा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

मैंने मुस्कुराते हुये कहा, “चाचा जैसा अपनी पोती के बारे में सोचते हो वैसा ही दूसरों की बेटी के बारे में भी सोचा करो। याद है मेरे बचपन में आप कटाक्ष करते थे जब मेरे साथ गाँव की कुछ लड़कियाँ भी साईकिल चलाना सीखती थीं, और आज ख़ुद अपनी पोती की साईकिल ख़रीदने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हो। समय बदल रहा है चाचा, अपनी सोच भी बदलो, गाँव में अगर साधन उपलब्ध हो तो बच्चियाँ ट्रेन से बाज़ार पढ़ने क्यूँ जाएँ, मजबूरी है तभी तो जा रही हैं, अभी कटाक्ष करते हो और भविष्य में जब ख़ुद पर आएगी तो उसी को फिर सराहोगे, क्या पता हरी चाचा की बेटी सच में कलेक्टर बन जाए, और नहीं तो कम से कम गाँव में ही कोचिंग खोल ले तब शायद आप के जगमला को इस तरह बाज़ार न जाना पड़े...”

तभी बीच में सत्तों चाचा कहने लगे, “लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई तो सिर्फ़ इसलिए है बेटा कि शादी के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता मिल जाए, हमें कौन सा डॉक्टर-इंजीनियर बनाना है या नौकरी करवानी है। आजकल जिसको देखो बहू-बेटियों को मास्टर बनाने मे लगा हुआ है, उसके लिए आसान-आसान तरीक़े ढूँढ़ रहा है, नौकरी करेगी, मर्दों के साथ उठना-बैठना होगा, घर का सारा संस्कार स्वाहा हो जाएगा, ये सब लड़कियों को शोभा नहीं देता।“

मैंने कहा, “चाचा, अगर सब कोई आपकी तरह सोचने लगे तो अपनी बहू–बेटियों के लिए जो लेडी डॉक्टर ढूँढ़ते हो… वो कहाँ से लाओगे? घर की औरतें खेतों में जा कर मज़दूरी करें, बकरियाँ चराएँ, चारा लाये, जलावन चुन कर लायें, ये शोभा देता है आपको, ऐसी औरतें आपलोगों की नज़रों में एक दम मेहनती और आज्ञाकारी होती हैं पर पढ़ी-लिखी, डॉक्टर-इंजीनियर या नौकरी करने वाली संस्कारहीन। क्या खेतों-खलिहानों में सिर्फ़ औरतें ही काम करती हैं? वहाँ भी तो मर्द रहते हैं। बचपन से देख रहा हूँ चाची ही पूरी चाय की दुकान सँभालती है, रघु चाचा की तो रात वाली उतरी भी नहीं होगी अभी तक, यहाँ भी तो सिर्फ़ मर्द ही रहते हैं और यहाँ पर कितनी संस्कार की बातें होती हैं ये तो आप सब भी जानते हो।“

सब चुप , किसी ने कोई प्रतिप्रश्न नहीं किया, मैं चला आया वहाँ से।

दो दिन बाद जब मैं सुबह-सुबह ट्रेन पकड़ने जा रहा था तो देखा स्टेशन जाने के रास्ते में जो मैदान पड़ता था वहाँ बादो चाचा अपनी पोती को साईकिल चलाना सीखा रहे थे, चाचा की नज़र मुझसे मिली और वो मुस्कुरा दिए, चाय की दुकान पर कही गई मेरी बातें असर कर गई थीं।


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