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08.31.2008

 
परिचय  
 
नाम :

मथुरा कलौनी

  मथुरा कलौनी का जन्म 20 जनवरी 1947 को पिथौराग़ढ, उत्तराखण्ड में हुआ था। बचपन पहाड़ों मंा बीता। शिक्षा दीक्षा कोलकाता में हुई। एक मल्टीनेशनल कंपनी में रिसर्च मैनेजर पद से सेवानिवृत हो कर आजकल बंगलौर में बसे हैं।
1980 से लिखना आरंभ किया। अब तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 150 से अधिक व्यंग्य और कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अधिकांश कहानियाँ हास्य और व्यंग्यप्रधान हैं। आप शब्दशिल्प द्वारा अपनी रचनाओं में हास्य पैदा करने में निपुण हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बनते बिग़डते संबंधों पर आपकी सटीक रचनाएँ चर्चित रही हैं।
अपने कार्यजीवन के तहत आपने विश्व के कई देशों का भ्रमण किया है जिसकी झलक आपकी लेखन में मिलती है।
1989 में आपने बंगलौर में कलायन नाट्य संस्था की स्थापना की जो बंगलौर में हिन्दी नाटकों का मंचन करती है। कलायन नाट्य संस्था प्रति वर्ष एक नाटक का मंचन करती आ रही है। मथुरा कलौनी के लिखे नाटकों का मंचन बंगलौर के नाट्य जगत में बहुत चर्चित रहा है। आपके लिखे एक नाटक का अनुवाद और मंचन कन्नड़ भाषा में हो चुका है। दो नाटक आकाशवाणी बंगलौर से तथा एक दूरदर्शन से प्रसारित हो चुके हैं।
बंगलौर में आप एक निर्देशक के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं। कलायन के सभी नाटक आपके निर्देशन में मंचित हुए हैं। आपको अभिनय में दक्षता हासिल है, आपने नाटकों और टेली सीरियल में अभिनय किया है।
हिन्दी को इन्टरनेट में लाने में मथुरा कलौनी का बड़ा योगदान है। 1999 में आपने कलायन वेबसाइट की स्थापन की। वेबसाइट www.kalayan.org की कलायन पत्रिका हिन्दी साहित्य की अपरिमित सेवा कर रही है।
प्रकाशित कृतियाँ : इसी भूमि में - उपन्यास - प्रियदर्शी अशोक पर एक नया दृष्टिकोण।
वहाँ से वापसी - उपन्यास
चंद्रभवन तृप्तिभवन - सरल हास से ओत-प्रोत उपन्यास वेबपत्रिका कलायन पत्रिका में
संदेश - नाटक - वेबपत्रिका अभिव्यक्ति में
चिराग का भूत - नाटक - वेबपत्रिका कलायन पत्रिका में

कहानियाँ - लगभग 150 - मनोरमा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माधुरी, कादंबिनी, वामा, मुक्ता, सरिता आदि में
प्रकाश्य
जोड़तोड़ - हँसी और ठहाकों से भरपूर नाटक (120 मिनट)
विषकन्या - रोमांचक उपन्यास
कायापलट - हास्य प्रधान (सायंस फिक्शन) नाटक
स्वयंवर - वैवाहिक संबंधों को एक संवेदनशील नाटक (90 मिनट)
चंद्रकान्ता नाटक - बाबू देवकीनंदन खत्री की मूल कथा का नाट्य रूपांतर। नाटक (135 मिनट)
जो पीछे रह जाते हैं - एक शहीद के परिवार को सम्मानित करने की भावना के पीछे छिपी दुनियादारी को उधेड़ता एक विचारोत्तेजक नाटक (75 मिनट)
कब तक रहें कुँवारे - हँसी ओर ठहाकों से भरपूर नाटक (100 मिनट)
चाय या कॉफी - दफ्तरी जीवन पर एक करारा व्यंग्य नाटक (45 मिनट)

कुछ चर्चित कहानियाँ

मोहिनी मूरत  - प्रिया में वे सभी गुण थे जो एक ऑफिस एसिस्टेंट के पद के लिए आवश्यक होते हैं। मोहिनी मूरत और सोहिनी सूरत। प्रचुर मेधा। सभी कुछ ठीक-ठाक और सुंदर। रिक्त पद के लिए उसका चयन हो गया।
दोपहर की मेनका - उसकी बड़ी-बड़ी आँखों को देख कर मैं ऐसे ही प्रश्न की अपेक्षा कर रहा था... यह लड़की उन लड़कियों में से थी जिनके बारे में कहा जाता है कि उनकी बुद्धि घुटने में होती है। ऐसी लड़कियाँ बहुत दुर्लभ होती हैं।.....
आगरा के साथ घाघरा का तुक मिलाने वाली लड़कियाँ आज-कल कहाँ हैं....
कब होगी भेंट - गजेन्द्र और रुकुमा का प्यार कुमाऊँ की प्रेमकथा का एकदम आधुनिक और आकर्षक संस्करण था। कैसा था उनका प्रेम?
दोनों को क्या-क्या कष्ट सहने पड़े? बिछुड़ जाने के बाद क्या वे मिल पाये?
एक बेहद दिलचस्प प्रेम कहानी।
बिलौरी की धूप - हे बाबुल मुझे छाना बिलौरी मत ब्याहना क्यों कि सुना है वहाँ की धूप बड़ी तेज होती है।........
'मैं आत्मनिर्भर पहले भी थी, चंदर। पर अपने जीवन साथी को अपने जीवन की बागडोर सौंपने में भी एक सुख होता है। तुमने वह सुख मुझसे छीना है चंदर।'.......
सुबह का भूला - वह धारे पर जब भी जाती, एक टीस उभरती थी। यहीं उसने लापता होने वाले को पहली बार अच्छी तरह से देखा था .......
एक सुबह को ठीक उसी जगह उसने एक अपरिचित को लेटे हुए पाया। पास जा कर देखा तो जी धक् से रह गया। वही चेहरा था। युद्ध की विभीषिका में न जाने क्या क्या झेलना पड़ा हो......
मेरे गाँव की लड़की - 'मैंने हंसी के साथ अच्छा नहीं किया भास्कर। उसके पास जाऊँ भी तो कैसे?'
'कैसे जाऊँ ! यह तुम क्या कह रहे हो नरेन दा? वह पराई थोडे ही है? तुम्हारे गाँव लड़की है। अपनों के पास जाने के लिए भी कोई ऐसा सोचता है भला!'
.... चाहे कैसी ही परिस्थितियाँ क्यों न आयें, रहेगी वह सदा उसके गाँव की लड़की। सरला चाची की बेटी।
धुँधले चित्र - '' बहुत संभव है यह पत्र तुम्हें मिलने तक मेरी हत्या हो चुकी हो। अगर ऐसा हो गया तो मेरा एक काम अधूरा रह जाएगा। इसको तुम अवश्य पूरा करना। गुरुजी।"
नाम में क्या धरा है - नाम पर अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका अर्थ निकलता है कि नाम में क्या धरा है। जी हाँ कुछ नहीं धरा है, सिर्फ़ इसके कि किसी व्यक्ति को उसके नाम से ही जाना जाता है। और हमारे समाज में सही नाम को लोग कितना महत्व देते हैं, इस पर पढ़िए एक भुक्तभोगी की बहुत ही दिलचस्प रचना।
सम्पर्क : kalauny@gmail.com