| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 02.23.2008 |
|
याद तुम्हारी आई |
|
याद तुम्हारी आई
घिर के घटा सावन की आई कली कली मुस्काई रिमझिम रिमझिम बरसे बादल पवन चली पुरवाई याद तुम्हारी आई जीवन तुम बिन सूना साजन अखियाँ नीर बहाएँ सखियों ने जब गाया सावन ली मन ने अँगड़ाई याद तुम्हारी आई आशा का मैं मन मन्दिर में तरसूँ दीप जला कर हुआ अकार्थ जीवन मेरा तुमसे नेह लगाकर हाय यह तन्हाई याद तुम्हारी आई |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|