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| 05.31.2008 |
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बिन पात बिन शूल |
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शब्दों के विशाल सागर से,
चुन चुन कर कुछ फूल। लय की डोर से बाँधा उनको बिन पात बिन शूल अपनी जगह हर फूल एक मोती जिसकी अपनी अलग एक ज्योति जिसकी चमक से दिल बेचारा, जाए सब कुछ भूल बिन पात बिन शूल शब्दों की बहती सरिता से, बन जाती है कविता, संग बहा ले जाती अपने मन की सारी धूल बिन पात बिन शूल |
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