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| 11.17.2008 |
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शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान |
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(डॉ०
मानवी (कुशवाहा) मौर्य द्वारा वर्ष २००६ में लखनऊ विश्वविद्यालय,
लखनऊ,
उ०प्र० से प्रो० कालीचरण स्नेही के निर्देशन में
“शमशेर
बहादुर सिंह की काव्यभाषाः अनुशीलन”
विषय
पर पी.एच.डी. पूर्ण की। उपरोक्त लेख उक्त शोध कार्य का अंश है।)
स्वान्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में जैसे विषय बदले,
वस्तु बदली और कवि की जीवन-दृष्टि बदली वैसे ही शिल्प के क्षेत्र में
रूप-विधान के नये आयाम भी विकसित हुए। कविता की समीक्षा के मानदण्डों में
एक बारगी युगान्तर आया और नये ढंग पर कविता की इमारत खड़ी की गई। कवि की
अनुभूतियाँ नये अप्रस्तुतों और प्रतीकों को खोजते-खोजते बिम्ब के नये
धरातलों को उद्घाटित करने में समर्थ हुई। कविता की जीवन्तता में
प्राणशक्ति के रूप में बिम्ब ने अपना स्थान और महत्व पाया।
प्रतीक और
अप्रस्तुत तो प्रारम्भ से ही कविता की समीक्षा के प्रतिमानों के रूप में
स्वीकृत थे,
अब
बिम्ब भी कविता के मूल्यांकन की कसौटी के रूप में स्वीकारा जाने लगा। यों
तो बिम्बों के निर्माण और चयन की प्रक्रिया संस्कृत साहित्य में ही प्रचलित
थी,
किन्तु तत्कालीन कवियों और समीक्षकों ने,
बल्कि आजादी से पहले तक हिन्दी के समीक्षकों ने भी बिम्ब को काव्य का
प्राणतत्व नहीं माना था। आजादी के बाद कई नये संदर्भ,
कई
नये शैल्पिक प्रतिमान सामने आये। इसका कारण पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव तो
था ही,
विदेशों में चल रहा बिम्बवादी आन्दोलन भी था। छायावादियों ने भी
अप्रत्यक्षतः शिल्प के अंग के रूप में
‘चित्रत्व’
को
स्वीकार कर लिया था। सुमित्रानन्दन पन्त ने जब काव्य-भाषा के विवेचन के
दौरान चित्रभाषा के प्रयोग की बात कही थी तो प्रकारानतर से बिम्ब को ही
काव्य-शिल्प के अंग और आलोचना के प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया था।
आचार्य शुक्ल भी बिम्ब को स्वीकृति दे चुके थे। उन्होंने
‘चिन्तामणि’
के
एक निबन्ध में लिखा था,
“काव्य
का काम है कल्पना में बिम्ब या मूर्तभावना उपस्थित करना”१
: स्पष्ट शब्दों में काव्य
कल्पना-चित्र नहीं है,
वरन् अनुभूतियों का मूर्तिकरण है।
बिम्ब
काव्य-भाषा की तीसरी आँख है,
जो
मात्र गोचर ही नहीं,
किसी अगोचर तत्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व (कालिदास-पहले से जो अवबोधन हो
उसकी स्मृति)-रूप से,
एक
ओर कारयित्री और दूसरी ओर भावयित्री भाषा के लिए उपलब्ध करती है।
बिम्ब
शब्द का अर्थ छाया,
प्रतिच्छाया,
अनुकृति या शब्दों के द्वारा भावांकन है। बिम्ब अंग्रेजी के इमेज शब्द का
हिन्दी रूपान्तर है। सी०डी० लेविस के अनुसार-
“The poetic image is more or
less a sensuous picture in words, to some degree metaphorical, with an
undernote and some human emotion, in its context but also charged with
releasing into the reader a special poetic emotion or passion.”
अर्थात् काव्यात्मक बिम्ब एक संवेदनात्मक चित्र है जो एक सीमा तक अलंकृत-रूपतामक भावात्मक और आवेगात्मक होता है। लीविस ने बिम्ब को भावगर्भित चित्र ही माना है।२
१. प्रकृति-बिम्ब
२. गंध बिम्ब
३. आस्वाद्य बिम्ब
४. नाद बिम्ब
५. दृश्य बिम्ब
६. स्पर्श बिम्ब
७. आद्य बिम्ब
८. स्मृति बिम्ब
९. भाव बिम्ब
१०. अप्रस्तुत बिम्ब
प्रकृति बिम्ब
(१)
एक नीला आइना
बेठोस सी यह चाँदनी
और अन्दर चल रहा हूँ मैं
उसी के महातल के मौन में।
मौन
में इतिहास का कन किरन जीवित,
एक,
बस।
(कुछ कविताएँ,
पृ० २१)
“शमशेर
के प्रकृति चित्रण में अतियथार्थवादी झलक बार-बार मिलती है। प्रकृति जितनी
उनसे बाहर है,
उतनी
ही भीतर है। यह चित्रण यथार्थ है तो दूसरा अतियथार्थ। कविता में वर्णन की
परम्परा और अनुभव का उन्मेष दोनों घुलते-मिलते हैं,
पर
शमशेर के यहाँ महत्व दूसरे का है। शायद यही कारण है कि प्रकृति चित्रण में
उनका लगाव जितना जल था कि आकाश से है उतना मिट्टी से नहीं।”७
(२)पी
गया हूँ दृश्य वर्षा काः
हर्ष
बादल का
हृदय
में भर कर हुआ हूँ। हवा सा हल्का।
धुन
रही थीं सर
व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें (कुछ कविताएँ,
पृ० ३७)
शमशेर में
विराट प्रकृति आत्मीय कैसे हो उठती है,
इसका अच्छा साक्ष्य उन की प्रसिद्ध कविता
‘सागर
तट’
प्रस्तुत करती है। जल,
पर्वत और वर्षा का व्यापक सन्दर्भ लेकर कवि ने उनसे एक घरेलू बिम्ब की रचना
की है। प्रेम की मनोभूति पर इनकी अंतर्प्रक्रिया कल्पना को हौले से सक्रिय
करती है-
(३)चाँदनी
में धुल गये हैं
बहुत
से तारे बहुत कुछ
धुल
गया हूँ मैं। बहुत कुछ अब।
- ० -
० -
चल
रहा है जो। शान्त सा इंगित सा
न
जाने किधर.............................................(कुछ कविताएँ,
पृ० २१)
(४)व्योम
में फैले हुए मेहराब के विस्तार
स्तूप
औ,
मीनार
नभ को थामने के लिए
उठते
हुए।
विकटतम थे अति विकटतम
विगत
के सोपान पर्वत श्रृंग (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ३३)
(५)पंक्तियों
में टूटती-गिरती
चाँदनी में लौटती लहरें
बिजलियों-सी कौधती लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
बार-बार (कुछ कविताएँ,
पृ० ३८)
गंध बिम्ब
(१)धुआँ।
धुआँ। सुलग रहा (कुछ कविताएँ,
पृ० ४०)
(२)जल
रहा। धुआँ धुआँ
गवालियार के मजूर का हृदय (वही,
पृ० ४१)
(३)सुलगता
हुआ पहरा
या
फानूस?
(कुछ
और कविताएँ,
पृ० १४४)
(४)सीने
में सूराख हड्डी का।
आँखों
में घास-काई की नमी। (वही,
पृ० १५४)
(५)थी
महक। शराब की (वही,
पृ० ८६)
आस्वाद्य बिम्ब
(१)हल्की
मीठी चा सा दिन
मीठी
चुस्की सी बातें
मुलायम बाहों का अपनाव। (कुछ कविताएँ,
पृ० ३६)
शमशेर की
कविता पढ़कर
‘अब
यह हम पर है,
कि
हम अपने सामने और चारों ओर की इस अनन्त और अपार लीला को कितना अपने अन्दर
घुला सकते हैं।’
‘दूब’
कविता की ये पंक्तियाँ जैसे शमशेर की अपनी कविता का ही रूप प्रस्तुत करती
हैं। शमशेर की समूची काव्य-प्रकृति उनके वर्ण्य,
बिम्ब और लय में अभेद है। साहित्य-समीक्षा में यह बार-बार कही जाती है कि
कवि की कोई पंक्ति उद्धृत करके अनिवार्यतः यह नहीं कहा जा सकता कि यह उस
रचनाकार की संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है।
(२)आखिर
क्यों मुस्कुराते हैं शराबी अधर?
(चुका
भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ३६)
(३)नमक
जैसे मैले संगमरमर का बादल (वही,
पृ० ५७)
(४)अभाव
के व्यंग्य से। (शमशेरः प्रतिनिधि कवितायें,
पृ० १९)
जूते
चबाता हुआ-सा मानो (शमशेर प्रति० कवि पृ० १९)
(५)दिलों
में जैसे मीठी फाँसें (काल तुमसे होड़ है मेरी,
पृ० ५१)
रूप बिम्ब
(१)नील
जल में या किसी की
गौर
झिलमिल देह
जैसे
हिल रही हो। (शमशेर की प्रतिनिधि कविताएँ,
पृ० १०२)
ऊषा के जल
में झलकता उज्ज्वल प्रतिबिम्ब जैसे राशि-राशि सौन्दर्य को अनन्त नील
गहराइयों में परिव्याप्त कर रहा हो,
ऊषा की सुन्दरता जादू या रहस्य की तरह फैल गई हो। विशेषता यह है कि जादू
यहाँ कोई अतिप्राकृत तत्व नहीं है,
वह
पूरे तौर पर प्रकृति से उपजता है।
(२)बादलों
की इन्द्रधनुषी हँसियाँ?
(कुछ
कविताएँ,
पृ० ४९)
(३)काला
काला
आँख
का तिल है
जोत
का द्वार! (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ५१)
(४)अपनी
अजीब-सी खनक और चमक लिए
गोरी
गुलाबी धूप (कुछ और कविताऍं,
पृ० १५८)
स्थिर बिम्ब
(१)ओ
शक्ति के साधक अर्थ के साधक
तू
धरती को दोनों ओर से थामे हुए (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ३२)
(२)रवि!
कमल के नाल पर बैठा हुआ मानो
एक
एड़ी पर टिकाए मौन (वही,
पृ० ७०)
(३)हिलते-चमकते
बहुत हरे छोटे-बड़े पेड़
मेरे
चारों ओर खड़े। (वही,
पृ० ८५)
(४)जो
कि सिकुड़ा हुआ बैठा था,
वो
पत्थर (कुछ कविताएँ,
पृ० ४४)
(५)एक
धुँधली बादल-रेखा पर टिका हुआ (कुछ और कविताएँ,
पृ० १२८)
(६)दोपहर
बाद की धूप-छाँह में खड़ी
इंतजार की ठेले गाड़ियाँ (वही,
पृ० १३१)
स्पर्श बिम्ब
(१)जहाँ,
उसने
अपना सर रखा था
तुम्हारे वक्ष पर
वह
स्थान बहुत ही मुकद्दस है। (काल तुमसे होड़ है मेरी,
पृ० ६४)
(२)गीली
मुलायम लटें,
आकाश
साँवलापन रात का गहरा सलोना
स्तनों के बिम्बित उभार लिए (कुछ कविताएँ,
पृ० ४८)
(३)एक
नीला आईना
बेठोस
सी यह चाँदनी (वही,
पृ० २१)
(४)खसर-खसर
एक चिकनाहट
हवा
में मक्खन-सा घोलती है। (वही,
पृ० ६२)
दृश्य बिम्ब
(१)धूप
कोठरी के आईने में खड़ी
हँस
रही है! (कुछ और कविताएँ,
पृ० ३७)
रंग-योजना
के प्रयोग में कवि ने विशेषकर लाल,
नीला,
पीला,
हरा आदि रंगों का उपयोग किया है।
(२)नील
आभा विश्व की
हो
रही है प्रतिपल तमस।
विगत
संध्या की
रह गई
है एक खिडकी खुलीः
झाँकता है विगत किसका भाव।
बादलों के घने नीले केश
चपलतम
आभूषणों से भरे
लहरते
हैं वायु संग सब ओर। (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ८७)
(३)धूप
में लिपटा हुआ है आसमान (कुछ कविताएँ,
पृ० ३२)
(४)गरीब
के हृदय
टँगे
हुए
कि
रोटियाँ लिए निशान (वही,
पृ० ४१)
(५)मैली,
हाथ
की धुली खादी
सा है
आसमान। (कुछ और कविताएँ,
पृ० ६०)
शमशेर-कविता में मनोवैज्ञानिक बिम्बों की सृष्टि सुबोध सुग्राह्य है। कवि
मन में सामान्य मनुष्य की तरह भाव-विचार,
धारणाऍं और घटनाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब बनते रहते हैं। मगर जब वह अपनी
सृजनात्मक क्षमता से उसे शब्दायित करता है तो बिम्बों की रचना होती है।
मनोवैज्ञानिक बिम्ब वाह्य वस्तु,
आकार,
रूप का प्रतिबिम्ब होते हैं। इसे मानस बिम्ब भी कहते हैं।
नाद बिम्ब
(१)मेघ
गरजे,
और
मोर दूर कई दिशाओं से
बोलने
लगे-पीयूअ! पीयूअ! (कुछ कविताएँ,
पृ० २०)
(२)हरहरा
कर उठ रहा है
नव
जनमहासागर! (वही,
पृ० ४३)
(३)हवा
में सन् सन्
ज्योति के जो हरे तीखे बान
चल
रहे हैं। (चुका भी हूँ मै नहीं,
पृ० ३६)
(४)पहली-पहली
गुटरग
गुटरग (काल तुमसे होड़ है मेरी,
पृ० ७१)
गति बिम्ब
(१)सीप-सी
रंगीन लहरों के हृदय में डोल (कुछ कविताएँ,
पृ० ३५)
(२)अनवरत्
बह रही है। (वही,
पृ० ४५)
(३)तैरती
आती बहार (वही,
पृ०. ६२)
(४)सुर्ख
फूल ओस में
चुपचाप
लुढ़कते चले जाते (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ३२)
(५)वह
सागर
सट्ठा
जो,
उठा,
और और
और (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ७१)
(६)जोकि
सिकुड़ा हुआ बैठा था वो पत्थर
सजग-सा होकर सरकने लगा आप से आप (कुछ और कविताएँ,
पृ० ३६)
(७)यह
रात फिसलन से भरी हुई है। (वहीं,
पृ० १४२)
(१)कहीं
दूर पार से
स्मृतियाँ
बहुत-सी
इकट्ठा हो रही हैं। (काल तुमसे होड़ है मेरी,
पृ० ५३)
(२)यह
आसमान
चूम
रहा है मेरी चौखट
मैं
चाँद और सूरज को निकाल
अलमारी में रखे हुए एलबम से (कुछ और कविताएँ,
पृ० १४३)
(३)आज
कहाँ वे गीत जो कल थे
गलियों-गलियों में गाए गए (काल तुमसे होड़ है मेरी,
पृ० ४२)
पूरब
से पश्चिम को एक कदम से नापता
बढ़
रहा है। (कुछ कविताएँ,
पृ० ८७)
(२)चुम्बन
की मीठी पुचकारियाँ
खिल
रही कलियों को फूलों को हँसा रही (कुछ कविताएँ,
पृ० ६२)
आद्य बिम्ब
(१)एक
ऋतुओं में विहँसते सूर्य
काल
में (तम घोर)- (कुछ कविताएँ,
पृ० १५)
(२)क्या
शिवलोक के बीच कोई
विभाजक दीवार
खड़ी
की जा सकती है
सिवाय
सच्चाई की उज्ज्वलता के (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० ५०)
(३)वरुणा
के किनारे एक चक्रस्तूप है
शायद
वहीं विश्व का केन्द्र है (वही,
पृ० ३१)
(४)इक
मौन कमल खिलता है
और
नयी लहरियों में लगातार
हँसता
है। (वही,
पृ० १०७)
(५)बिजलियों-सी
कौंदली लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
बार-बार (कुछ कविताएँ,
पृ० ३८)
अलंकृत बिम्ब
(१)सूर्य
मेरी पुतलियों में स्नान करता
केश
वन में झिल मिलाकर डूब जाता
स्वप्न-सा निस्तेज गतचेतन कुमार (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० २४)
(२)एक
नीला दरिया बरस रहा है
और
बहुत चौड़ी हवाएँ
मकानात है मैदान
किस
कदर ऊबड़-खाबड़
मगर
एक
दरिया
और
हवाएँ
मेरे
सीने में गूँज रही हैं। (चुका भी हूँ मैं नहीं,
पृ० १७)
(३)बादलों
के घने नीले केश
चपलतम
आभूषणों से भरे
लहरते
हैं वायु संग सब ओर।
अल्लमत यदि मैं संस्कृत में
संध्या कर ली तो तू
मुझे
दोजख में डालेगा?
(वही,
पृ० १०८)
(४)ईश्वर
अगर मैंने अरबी में
प्रार्थना की तू मुझसे
नाराज
हो जाएगा। (वही,
प१० ८७)
अप्रस्तुत
को प्रस्तुत करने के लिए कवि तुलना,
सादृश्य,
साम्य,
विपय्रय,
सान्निध्य,
आवेग संकर्षण तथा एकरूपता के संयोग का सामान्यतः उपयोग करता है।
छायावादोत्तर कवियों में गिरिजा कुमार माथुर,
अज्ञेय,
धर्मवीर भारती,
मुक्तिबोध,
अंचल,
सर्वेश्वर,
श्रीकान्त वर्मा,
राजकमल चौधरी,
धूमिल आदि की कविताओं में इसका प्रायः प्रयोग हुआ है। शमशेर के काव्य में
अप्रस्तुत कहीं-कहीं आकारमूलक रूप में भी प्रस्तुत हुआ है-
(५)शिला
का खून पीती थी
वह जड़,
जोकि
पत्थर थी स्वयं।
सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलती
टहनियों-सी,
और वह
पक्का चबूतरा,
ढाल
में चिकनाः
सुतल
था,
आत्मा
के कल्पतरु का?
(कुछ
और कविताएँ,
पृ० १५५)
जिस
प्रकार उन्होंने
‘पक्का
चबूतरा’
को
उपरोक्त कविता में आकार प्रदान किया है उसी प्रकार
‘सींग
और नाखून’
कविता में आलंकारिक बिम्बों को यूँ रूपायित किया है-
(६)सींग
और नाखून
लोहे
के बख्तर कन्धों पर।
सीने
में सूराख हड्डी का।
आँखों
में घास-काई की नमी।
एक
मुर्दा हाथ
पाँव
पर टिका
उल्टी
कलम थामे।
तीन
तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।
जड़ों
का भी कड़ा जाल
हो
चुका पत्थर। (कुछ और कविताएँ,
पृ० १५४)
आकारमूलक
अप्रस्तुत विधान की बड़ी प्रभावी प्रस्तुति नागाज्रुन,
नरेश मेहता,
कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह,
जीवन प्रकाश जोशी,
जगूड़ी,
रमेश गौड़ की कविताओं में हुई है। इन कवियों ने नयेपन की तलाश में परम्परा
की जीवन्तता को बिम्बायित किया है। उनकी कविता में जन-जीवन समाजधर्मी
विविधवर्णीय रूप-रंग के बिम्ब प्रतीक हैं जो उन्हें समकालीन समवयस्क कवियों
से अलग करते
हैं।
कुसुमों से चरनों का लोच लिए
थिरक
रही हैं
भीनी
भीनी सुगन्धियाँ (कुछ कविताएँ,
पृ० ६३)
इसी
प्रकार-
और
दरिया राग बनते हैं।-कमल
फानूस-रातें मोतियों की डाल-। दिल में
साड़ियों के से नमूने चमन में उड़ते छबीले,
वहाँ
गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह-
जागता
भी। मौन सोता भी,
न
जाने
एक
दुनिया की। उम्मीद-सा। किस तरह! (वही,
पृ० ६५)
उक्त
बिम्बों के अतिरिक्त शमशेर के काव्य में अप्रसृत और उदात्त बिम्बों का
विधान भी है। अप्रसृत बिम्ब उक्त सभी बिम्बों से अलग प्रतीत होता है। इसमें
शब्द-विस्तार या शब्द-बाहुल्य नहीं होता। कुल मिलाकर,
शमशेर के काव्य का उत्तरार्ध बिम्ब-बहुल है। ये कवि की अनुभूति को गहराई और
ऊँचाई प्रदान करते हैं। उनके काव्य में जहाँ एक ओर वस्तुपरक यथार्थ बिम्ब
है वहीं दूसरी ओर रोमानी यानी स्वच्छन्द बिम्बों की प्रकल्पना भी की जा
सकती है। उनकी विता में प्रकृति के उपादानों और अनुभूतियों का बड़ा अनूठा
तालमेल है। कहीं-कहीं साहचर्य-समन्वय भी व्यक्त हुआ है। कल्पना-शक्ति का
सौष्ठव देखते ही बनता है। कलागत उपलब्धि के अर्थ में शमशेर की कविता अपना
विशिष्ट मूल्य रखती है। इस दृष्टि से उनके काव्य में वाह्य उद्दीपन
(शब्द-स्पर्श-रस और गंध बिम्बों) के निर्माण की प्रक्रिया बड़ी सूक्ष्म है।
यूँ मूल अनुभूति की अतीतता का ज्ञान उनके बिम्बों में होता है।
बिम्ब विधान
सन्दर्भ सूची
१.चिन्तामणि - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पृ० २२८
२.सी०डी०
लेविस - पोयटिक इमेज,
पृ० २२
३.हैलेः
डॉ० नगेन्द्र द्वारा उद्धृत काव्यात्मक बिम्ब,
पृ० ५
४.रेनेवेलेक एण्ड अस्टिन वारेन - थिअरी ऑफ लिटरेचर,
पृ० १८७
५.कविता
की तीसरी आँख - प्रभाकर श्रोत्रिय,
पृ० ३०
६.गिरिजा
कुमार माथुरः काव्य दृष्टि और अभिव्यंजना - डा० राहुल,
पृ० १५३
७.रामस्वरूप चतुर्वेदी - नई कविताः एक साक्ष्य,
पृ० ८०
८.डा०
केदार नाथ सिंह - आधुनिक हिन्दी काव्य में बिम्ब विधान,
पृ० २१०
९.आचार्य
शुक्ल - चिन्तामणि प्रथम भाग,
पृ० १५३
१०.काव्य
बिम्ब - डॉ० नगेन्द्र,
पृ० १४
११.आधुनिक
हिन्दी कविता में शिल्प - कैलाश वाजपेयी,
पृ० २८५ १२.शमशेरः कवि से बड़े आदमी - सं० महावीर अग्रवाल, पृ० ११३ |
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