अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.23.2014


मटमैले लबादे वाला सान्ताक्लॉज़

मटमैले लबादे वाला सान्ता क्लॉजआज आफिस से ही उमा को फोन कर दिया है हमेशा की तरह। पुरानी हिदायतें जो बरसों से दोहराता आ रहा हूँ, फ़िर समझा दी हैं के बच्चों की जुराबें खूब अच्छे से धोकर जैसे भी हो रात तक सुखा ले। टॉफी चॉकलेट वगैरह मैं ख़ुद ही लेता आऊँगा। आज क्रिसमस है ना...? उनके बहुत छुटपन से ही सांताक्लॉज़ के नाम से और बहुत से पिताओं की तरह मैं भी उनकी मासूम कल्पना को उड़ान देता रहा हूँ। सुबह दोनों पूछते हैं आपस में एक दूसरे से कि क्या रात को उसने किसी सान्ताक्लॉज़ जैसी चीज़ का घर में आना महसूस किया था या नहीं। पर हमेशा की तरह किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते और अपनी-अपनी चॉकलेट और टॉफी खाने जुट जाते हैं बगैर पेस्ट किए। कभी भी तो ये सोचना नहीं चाहते के रात को थका-हारा इनका बाप ही ये सब अपने मटमैले से लबादे में से निकाल कर ठूँसता होगा उस दिन की स्पेशल से धुली जुराबों में। इनकी कल्पना में तो आज भी वो ही सुर्ख लाल लबादे वाला सांताक्लॉज़ बसा है। पहले तो हम भी इस बैठक में शामिल होते थे, इनकी कल्पनाओं में अपने भी रंग भरने के लिए ....हाँ रात को कुछ आवाज़ सी सुनी तो थी पर दिखा कुछ नहीं था, सांता क्लॉज़ ही रहा होगा और भला इत्ती रात में कौन आएगा तुम लोगों के लिए ये गिफ्ट लेकर। पर अब भीतर उदासीनता सी हो गयी है इस ड्रामे के प्रति। अब ये बचपना ही चिंता का कारण हो गया है। आख़िर आठवीं दसवीं क्लास के बच्चों का सान्ताक्लॉज़ से क्या काम। क्या अब इन्हें थोड़ा समझदार नहीं हो जाना चाहिए? टॉफी चॉकलेट तो यूँ भी खाते रहते हैं पर क्या आज के दिन ये उतावलापन शोभा देता है इतने बड़े बच्चों को? जीवन की बाकी सच्चाइयों को किस उमर में जानना शुरू करेंगे फ़िर। अब तो ध्यान जब-तब इनके साथ के और बच्चों पर जाने लगा है। अकल भी अब मसरूफ़ रहती है जिस्मानी उठान और समझ के बीच ताल-मेल बैठाने में। कभी इनके स्कूल का कोई और बच्चा घर आ जाता है तो आँखें ख्यालों के साथ मिलकर उसकी समझदारी का साइज़ समझने बैठ जाती हैं। पता नहीं स्कूल में ये लोग सांता क्लाज़ के बारे कोई बात करते हैं या नहीं..? हो सकता है कि इन दिनों पड़ रही छुट्टियों के कारण इस विषय पर चर्चा न हो पाती हो ...वरना इतने बड़े बच्चे और ऐसी बचकानी..। कई बार चाहा है कि ख़ुद ही इन्हे रूबरू करा दूँ सच्चाई से पर जाने क्यूँ ये भरम इस तरह नहीं तोड़ना चाहता। इनके विकास को लेकर मन का ज्वार-भाटा बढ़ता ही जाता है। अख़बारों में निगाहें अब बाल मनोचिकित्सकों के लेख ही तलाशती रहती हैं। आई क्यू. ई क्यू. ऐसे क्यूँ वैसे क्यूँ कुछ समझ नहीं पाता। कद के साथ बढ़ता बचपना दो-तीन साल से हताशा को और बढ़ा ही रहा है। कई बार ख़ुद को दोषी पाता हूँ के शायद मैं ही स्वार्थवश बाल्यावस्था को समुचित रूप से....। हमेशा जुराबों से चॉकलेट निकालते समय मेरी आँखें इनके चेहरे पर गड़ी होती हैं, बस एक नज़र इनकी बे एतबारी की दिख जाए तो कुछ सुकून मिले, कभी तो एहसास कराएँ मुझे बड़े होने का। कैसे जानें कि मटमैले लबादे वाला इनका सांताक्लॉज़ अब कैसा बेसब्र है इनकी उम्र का भेद जानने को।

आज तो ऑफ़िस में ही काफ़ी देर हो गयी है। बाहर आया तो देखा के बाज़ार भी बंद हो चला है। इलाके की बत्ती भी जाने कब से गुल है। चाल काफ़ी तेज हो चली है, निगाहें तेज़ी से दायें बाएँ किसी खुली दूकान को तलाश रही हैं....दिल बैठ रहा है ..अब के शायद आँगन में टँगी चक-दक धुली सफ़ेद जुराबें बस टँगी ही रह जायेंगी...क्या ऐसे टूटेगा मासूमों का भरम ...क्या गुज़रेगी बेचारों पर...? बेबस सा आख़िर में आफिस के उस अर्जेंट काम को ही कोसने लगा हूँ। इसके अलावा और कर भी क्या सकता है एक मटमैले लबादे वाला। सुबह उसे एक अलग ही रूप लिए जगना होगा अब की बार। मन के भीतर किसी छोटे से कोने में इसकी भी रिहर्सल चल रही है। इन सब के बीच नज़र में किसी थकी हुई सी लालटेन की धुँधलाती रोशनी आ गयी है। मुझ से भी ज़्यादा थका सा लग रहा कोई दूकानदार अपनी दूकान बढ़ाने को तैयार है शायद, "ज़रा एक मिनट ठहरो......!!" कहता हुआ थका हारा सान्ताक्लॉज़ दौड़ पडा है इस आखिरी उम्मीद की तरफ़। इसी उम्मीद से तो बच्चों का वो भरम बरकरार रह सकता है जिसे वो कब से तोड़ना चाहता है। जल्दी से जेब से पैसे निकाले और उखड़ी साँसों पे लगाम लगाते हुए दोनों बच्चों के फेवरिट ब्रांड याद करके बता दिए हैं। दूकानदार किलसने के बजाय खुश है। और एक वो है के आफिस से निकलते निकलते एक अर्जेंट काम के आने पे कितना खीझ रहा था। बमुश्किल दस-पन्द्रह कदम दौड़ने पर ही साँसें कैसी उखड़ चली हैं। दुकानदार ने सामान निकाल कर काउंटर पर सजा दिया है। चॉकलेट के गोल्डन कलर के रैपर कुछ ज़्यादा ही पीलापन लिए चमक रहे हैं। शायद लालटेन की रोशनी की इन्हें भी मेरी तरह आदत नहीं है। मैंने सामान उठा कर लबादे में छुपाया और घर की तरफ़ बढ़ गया। तेज़ रफ़्तार चाल अब बेफिक्र सी चहल कदमी में तब्दील हो गई है। अब कोई ज़ल्दी नही है बल्कि अच्छा है कि बच्चे सोये हुए ही मिलें। मेरा अंदाज़ा सही निकला। दोनों बच्चे नींद की गहरी आगोश में सोये हैं.....एकदम निश्छल, शांत....दीन दुनिया से बेफिक्र। मैं और उमा खुले आँगन में आ गए हैं, बाहर से कमरे की चिटकनी लगा दी है ताकि किसी बच्चे की आँख खुल भी जाए तो हमारी इस चोरी का पता न चल सके। मोमबत्ती जला कर हमने धुली जुराबों में बच्चों की पसंद के अनुसार सौगातें जचा-जचा कर रखना शुरू किया। जुराबों में हल्का सीलापन अब भी है जो की रात भर आँगन में टँगे-टँगे और बढ़ जाएगा मगर रैपर बंद चीज़ों का क्या बिगड़ता है।

सुबह आँखें लगभग पूरे परिवार की एक साथ ही खुली। दोनों बच्चों ने भरपूर उतावलेपन से अपनी-अपनी रजाइयाँ फेंक दीं और कुण्डी खोल के खुले आँगन में लपक लिए बगैर जाडे की परवाह किए। दोनों जोशीले तार में लटकी उलझी अपनी-अपनी जुराबें खींच रहे हैं भले ही उधड़ती फटती रहें, उनकी बला से। उन्हें क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो बस सांताक्लॉज़ के तोहफों से मतलब है हमेशा की तरह। बेकरारी पूरे शबाब पर है .....चक-दक जुराबों में तले तक पैबस्त उपहारों को उँगलिया सरका-सरका के पट्टीदार दहानों से उगलवाया जा रहा है। सान्ताक्लॉज़ की नेमतें सोफे पर टपक रही हैं मगर आज बच्चे इन्हें अजीब सी नज़रों से देख रहे हैं। जाने उपहारों में आज ऐसा क्या खुल गया है के इनके चेहरे पर उत्साह के रंग मायूसी में बदल गए। सबसे पहले तो ज़रूरत से ज्यादा पीलापन लिए गोल्डन कलर की जांच हुई और फ़िर पारखी नजरें प्रोडक्ट की स्पेलिंग चेक करती हुई नीचे लिखा अस्पष्ट मैनुफक्चारिंग एड्रेस समझने लगीं। मेरे कुछ समझ पाने से पहले ही दोनों अपनी अजीब सी शक्लें बनाते हुए और भी ज्यादा बचपने में भर गए ........

"पापू....!! ये क्या ले आए......?...डुप्लीकेट है सारा कुछ..!! ये टॉफी भी ...."

"हाँ .. पापू..! मेरे वाला भी बेकार है एकदम से ...!!"

"आप भी ज़्यादा ही सीधे हो ..बस..कोई भी आपको बेवकूफ बना दे...हाँ नहीं तो.."

"आज के बाद उस दूकान पे आप ...!!!!"

बच्चे अचानक संभल गए। गोल-गोल आँखें मटकाती दो शक्लें, दांतों के तले दबी जीभ..। इस अचानक की पर्दाफाशी से मैं भी हैरान हूँ। दोनों दबी-दबी मुस्कान लिए, मुझसे आँखें बचाते हुए अपनी अपनी चॉकलेट का ज़रूरत से ज्यादा पीला रैपर उतार रहे हैं। एक बार फ़िर नजरें उठ कर मिली हैं और अब कमरे में ठहाके फूट चले हैं ....बच्चों के मस्ती भरे और हमारे छलछलाई आँखों से..!! बच्चे अभी छोटे हैं शायद ..हमारा ये भरम टूट चुका है.. बिलंग्नी पर टंगे मटमैले लबादे से कहीं कोई सुर्ख लाल रंग भी झाँकता दिख रहा है..।।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें