अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
09.30.2014


चंचल मन

चंचल मन है नटखट ऐसा,
कभी भागता इक ओर, कभी दौड़ता उस छोर,

इसके खालीपन में गुंजित होती एक आस कहीं,
भर जाता उल्लास से अगले पल बस यूँ ही,

नाचता है मद भरे मोर सा कभी,
कराहता ग़म भरे अनाथ सा कभी,

कैसे जताये इस पर अपना अधिकार,
ये ना करता हमारी इच्छा स्वीकार।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें