| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
|
मुझको अपना एक पल... |
|
मुझको अपना एक पल वे दे के अहसाँ कर गये
जाने अनजाने मेरे जीने का सामाँ कर गये क्या कहें कि सबसे आके किस तरह से वो मिले मुझको मेरे घर में ही जैसे कि मेहमाँ कर गये बाद मुद्दत के ज़रा सा चैन आया था अभी हाल मेरा पूछ कर वो फिर परेशां कर गये दोस्ती ना की सही अब दुश्मनी कर ली, चलो कुछ नहीं तो एक रिश्ता ही दरमयाँ कर गये लोगों का अब चाँद से तो फ़ासला कम हो गया अपने घर की ही ज़मीं को ‘दोस्त’ वीरां कर गये |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|