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05.03.2012
 

लौ और परवाना
मानोषी चैटर्जी


एक चिराग़ जल रहा था
लौ भी धीमे धड़क रही थी
किसी हवा के झोंके से डर
धीर धीरे फफक रही थी
काले काजल से डूब कर
तार धुएँ की निकल रही थी
छाती उसकी जल रही थी
काँपती बाती मचल रही थी
दर्द में डूबा उसका दिल था
बुझने को भी मुकर रही थी
आने की प्रीतम की आस में
दर्द पी के भी जल रही थी
आया तभी वो जो परवाना
अपनी प्रिया से बातें करने
देखा न उसने दर्द प्रिया का
सारे दिन की कहानी कहने
चारों तरफ उसने लौ की
बलायें ली जो घूम घूम कर
प्रेम की ज्वाला में जल करके
प्यार जताया हौले से चूम कर
तभी हवा के एक झोंके ने
दो प्रेमी के मिलन से जल के
घेर लिया दोनों को आकर
अपना सौम्य रूप बदल के
परवाना लिपटा लौ के दिल से
और
लौ ने पी को गले लगाया
दोनों ने जां दे दी अपनी
रात का साया फिर गहाराया
अंधेरा फिर से जाग उठा
औ रात ने फिर ली अंगड़ाई
मगर किसी दीवाने ने आकर
फिर एक दीये की लौ जलाई।।।


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