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05.03.2012
 

बदलाव
मानोषी चैटर्जी


ज़िंदगी चलती जाती है। हर साल कुछ नयापन सा लिये होता है, हर किसी के लिये, मगर मेरे लिये नहीं। कभी कुछ नया सा आता है और फिर उसी पुराने रास्ते पर चलने को मजबूर कर चला जाता है अपना नयापन वापस अपने साथ लिये। पिछले साल जो किया, वही इस साल भी, उसके पिछले साल भी, और उसके भी। हाँ कुछ अगर बदला है तो भौगोलिक स्थिति बदली है। पुराना शहर कभी नये में बदलता है और कभी पुराना घर नये में। मगर ज़िंदगी जैसे इसी जमाव में खुश है। इत्मीनान आराम की ज़िंदगी का आदी हो जाता है इंसान। बदलाव चाहता है पर फिर नयेपन से घबराता भी है। नींद और ऐसी सोचों का पुराना रिश्ता है। सुबह अलार्म की आवाज़ से नींद खुलती है। मशीन की तरह उठ कर अपने आप ही पैर किचन की ओर बढ़ जाते हैं, चाय बनानी है, रमेश के कपड़े इस्तरी करने हैं, मुन्नी को तैयार करना है, और खुद आफ़िस जाना है। ज़िंदगी है, वही पुरानी, आराम कहाँ है।

 

आज मिस्टर मेहरा का फ़ेयर्वेल था। रिटायर हो गये हैं। अब घर पर आराम होगा, कह रहे थे। बहुत खुश दिख रहे थे। मगर आखें छलक भी रही थीं। बदलाव आ रहा है ज़िंदगी मॆं उनके, तो खुश हैं कि दुखी कहना मुश्किल है। मैं रो पड़ी थी। मेरे आफ़िस जाइन करने से लेकर आज तक मिस्टर मेहरा ही ने मुझे सब कुछ सिखाया। बड़े भाई की तरह ही हमेशा डाँटा, समझाया। कुछ खाली पन हो गया है अब यहाँ। मगर ज़िंदगी चलती रहती है। कुछ भी नहीं बदलेगा। कुछ दिनों से यही सवाल खाये जा रहा है, क्या कुछ नहीं बदलता? बोर हो चुकी हूँ इस ज़िंदगी से। लगता है कभी कभी कि एक ज़ोरदार कुछ हो कि मायने बदल जायें ज़िंदगी के। मिस्टर मेहरा की जगह खाली हुई है। कल उनकी जगह कोई और आ रहा है, सुना है कि चयन तो हो चुका है। खैर, कोई भी हो, ज़िंदगी वही रहेगी।

 

कुछ बदलाव आये हैं। मैं ज़्यादा सजने सँवरने लगी हूँ आजकल। कोई कह रहा था आजकल ज़्यादा खुश भी दिखती हूँ। आजकल सब कुछ अच्छा लगने लगा है। रोज़ सुबह उठना बुरा नहीं लगता। ज़िंदगी बदल रही है या बदलाव का ढोंग है पता नहीं। पर नयापन अच्छा लग रहा है।

 

आज मुन्नी से मिलने का दिन था। कोर्ट ने सप्ताह में एक ही दिन मिलने के लिये दिया है। सच बदल गयी है ज़िंदगी। अकेले रहना आसान नहीं। ज़िंदगी गवर्मेंट के क्वाटर्स की पुरानी एकरंगी दीवारों से बदल कर चमकते फ़्लैट की दीवारों की ओर रुख़ करने की कोशिश में बदरंग तो नहीं हो गई? मुन्नी से मिलने की आस में ही सप्ताह गुज़र जाता है। एकदम नया रंग है ज़िंदगी का। मगर बदलाव कहाँ है। भरेपन में भी खालीपन था और खालीपन में भी खालीपन है। अभी भी वही है ज़िंदगी। चल रही है। सुबह उठना, अपने लिये चाय बनाना नहीं बदला और न ही आफ़िस जाना। हाँ, भूगोल फिर बदला है, आफ़िस की चारदीवारी बदली है, घर बदला है। मगर और सब कुछ वही है। ज़िंदगी इस मोड़ पर आ कर पीछे ताक रही है। सच कुछ भी तो नहीं बदला।


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