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05.03.2012
 

ऐ रात संभल कर चल जरा
मानोषी चैटर्जी


ऐ रात संभल कर चल जरा
लगी है आँख इक पल जरा
बरसों की तू भी जागी है
अब चैन से तो ढल जरा
ऐ रात संभल कर चल जरा

ऐ ख्वाब तू भी सो ही जा
आँखों में न कोहराम मचा
पलकों पे बैठा पैर झुलाये
गिर न जा, संभल जरा
ऐ रात संभल कर चल जरा

परछाईं चुपके छुप के चल
दीवारें देख सोती हैं
श्श्श्श आज इनको सोने दे
हर रात मुझ संग रोती हैं
तन्हा ही आज बहल जरा

ऐ चाँद हँसना छोड़ कर
बादल पे रख सर सो ही जा
छुप छुप के तू भी मेरे संग
है इंतजार में जगा
इतरा के कम मचल जरा

तन्हाई मुझको छोड़ के
तन्हा न जा, संग हो ले
बाँहों में मेरे नींद है
तो क्या, दामन में तू सो ले

मिलना फिर मुझसे कल जरा
ऐ रात संभल कर चल जरा


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