| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
|
दुआ में तेरी असर हो कैसे |
|
दुआ में तेरी असर हो कैसे
सिर्फ़ फूलों का शहर हो कैसे आप आ तो गये ज़िन्दगी में साथ ये ज़िन्दगी बसर हो कैसे बात जज़्बात की होती नहीं बस रेत पर खड़ा ये घर हो कैसे ये मुहब्बत है कोई खेल नहीं इतना आसाँ भी सफ़र हो कैसे ढूँढते ही रहे चारों तरफ़ हम दिल में जो छुपा, उधर हो कैसे आप से हम ख़फ़ा तो नहीं हैं दोस्ती ऐ ‘दोस्त’ मगर हो कैसे |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|