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ISSN 2292-9754

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07.14.2014


न्याय-अन्याय

7.

 भैया की शादी उसकी और दीदी के शादी के एक साल पहले हुई थी। भैया ने ख़ुद ही लड़की पसंद की थी और घर में उस बात को लेकर बहुत तनाव था। माँ इस शादी के ख़िलाफ़ थीं मगर पापा ने उनकी शादी के लिये हाँ कर दी थी। भाभी और भैया इलाहाबाद में रहते थे और कभी-कभी ही आना जाना होता था उनका। भाभी के तौर तरीके महंगे थे और उनके आने से माँ में और भाभी में तनाव हो जाता था। भैया-भाभी ने बाद में आना और कम कर दिया था। सभी भाभी को दोषी ठहराते थे। मधूलिका की शादी के वक़्त भाभी बहुत बीमार थीं। फिर बाद में सब ठीक हो गया था। अभी एक साल पहले भैया का तलाक़ भी हो गया था। उसे इस तलाक़ की वज़ह ख़ास नहीं पता थी...कितना कुछ था जो उसे मालूम नहीं था अपने ही परिवार के बारे में। वह भैया से कैसे पूछे कि सुदर्शना का वह क्यों और किस तरह सम्मान करते हैं। क्या बात है।

सुबह माँ से छुपा कर उस डायरी के कुछ और पन्नों को उलट पुलट कर कुछ ढूँढने की कोशिश करने लगी मधूलिका। सिर्फ़ पापा की कवितायें और गीत मिले उसे उस डायरी में। कई प्रेम गीत भी जो कि समर्पित थे सुदर्शना को। पापा के गीतों में प्रसाद जी की छाया देखने को मिलती थी। गीतों के ही बीच मिली पापा की लिखावट में मधूलिका को कुछ और पंक्तियाँ। "वही जो मैं नहीं कहता, और तुम हमेशा कहती हो मुझे कहने के लिये। कह नहीं पाया सुदर्शना कभी, पर सच में मैं तुमसे...अब वही बस जो मैं नहीं कहता"

पापा का यह रूप असहनीय था मधूलिका के लिये। फूट-फूट कर रोने लगी मधूलिका। धुंधले हुये अक्षरों के बीच अचानक ही पीछे से कंधे पर किसी के हाथ के आश्वासन की छुअन से वह चौंकी। पीछे मुड़ कर देखा तो माँ थीं। माँ की आँखों में देख कर जैसे वह ख़ुद को रोक नहीं सकी, लिपट कर माँ से रो पड़ी। माँ ने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटा मुझे कोई ग़म नहीं, बहुत कुछ ले लिया था इस औरत ने पर बहुत कुछ त्यागा भी है इस औरत ने। आज तुम्हारी माँ जिस सम्मान के साथ हैं समाज में, यह भी उसके लिये और अपने संसार का सुख जो खो दिया मैंने वह भी इसके लिये। आज बच्चे मेरे हैं वह भी इसके लिये और बच्चों ने जो सहा वह भी इसके लिये। क्या दोष दूँ और किस बात का ऋण उतारूँ।" माँ पत्थर सा बोल रहीं थीं। मैं बिस्तर पर तकिया ले कर बैठ गई। और माँ भी पास ही बैठ गईं।

"सुदर्शना शादीशुदा थी। तुम्हारे पापा से उम्र में बहुत छोटी। पहले दोनों में पत्राचार शुरू हुआ था। सब कुछ ठीक ही था, मैंने भी बहुत ध्यान नहीं दिया था, मगर बाद में तुम्हारे पापा ने कहा कि वह उससे प्रेम करते हैं। बाद में दोनों की शादी रहते हुये भी शादी कर ली थी दोनों ने छुप कर कहीं मिल कर। एक औरत पर क्या बीतती है जब कोई दूसरी औरत उसका घर छीन ले और पति का प्यार उसके लिये उतर जाये, यह वही समझ सकती है जिस पर गुज़री हो। ऐसी पीड़ा, ऐसा दंश और ऐसा अपमान, मौत भी सोचने को मजबूर करता है। मैंने भी कोशिश की थी। जीने का कोई उद्देश्य नज़र नहीं आता था। कई बार लगा ज़हर खा लूँ, कई बार पुल से छलांग लगाने की भी सोची, पर फिर तुम लोगों का चहरा याद कर के कुछ नहीं कर पाई। औरत बीवी बाद में, पहले माँ होती है। मेरे बिना तुम लोगों का क्या होगा, यही सोचती थी मैं। तुम्हारे पापा को भी वापस पाने की कोशिश बहुत की थी मैंने। तुम्हारी दीदी भी रोती थीं। उसकी तबीयत भी इसी वज़ह से ख़राब रहने लगी थी। सुदर्शना से बात कर के मैंने सोचा था कोई हल निकालूँगी। मगर उससे बात करते ही मेरा पारा चढ़ जाता था। मैं कभी भी उससे ठीक से बात नहीं कर पाई। मेरा भरापूर संसार छीन लिया था उसने मुझसे, और कभी भी उसे इस बात की ग्लानि नहीं हुई। तुम्हारे पापा के जाने के वक़्त भी वह साथ रही उनके। उनके जाने से पहले तुम्हारे पापा ने ही दी थी मुझे यह डायरी। सुदर्शना के लिखे ख़त हैं इसमें और उनकी भी लिखी कुछ चीज़ें। तुम न जानो सब तो ही ठीक है छोटी। मुझे थोड़ी देर अकेला रहने दो अब...थक गई हूँ।"

मधूलिका उठ कर चुपचाप चली गई थी। मगर उसकी माँ को उसने एक लिफ़ाफ़े में से कुछ पर्चे निकालते हुये देखा। लगता था ख़ाली वक़्त में उसकी माँ उन चिट्ठियों को ही पढ़ा करती थीं। सुदर्शना की यह चिट्ठियाँ, डायरी के कुछ पन्ने, उस डायरी में मुड़े रखे थे। कब और क्यों भेजे होंगे उसने पापा को, कैसे आई होंगी पापा के पास ये चिट्ठियाँ उसे नहीं मालूम था।

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