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ISSN 2292-9754

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07.14.2014


न्याय-अन्याय

6.

 दीदी से उसकी बहुत दोस्ती नहीं रही थी बचपन से ही। दीदी भले ही उस से सिर्फ़ ५ साल बड़ी थीं मगर व्यवहार कई साल बड़ों जैसा करती थीं। हर बात पर सलाह देना और उसके हर काम पर निगरानी रखना जैसे दीदी अपना कर्तव्य समझती थीं। दीदी पापा जैसी गंभीर प्रकृति की थीं। बचपन में भी दोनों साथ कम ही खेले थे। भैया के साथ उसकी ज़्यादा दोस्ती रही थी जब कि भैया उससे ७ साल बड़े थे। दीदी के शादी के एक दो साल पहले जैसे दीदी अचानक ही सबसे बेज़ार सी हो गईं थीं। बात करना और कम कर दिया था उन्होंने घर में किसी से भी और अक्सर ही अपने काम में व्यस्त रहने लगी थीं। उनकी शादी के एक ही साल बाद मधूलिका की भी शादी हो गई थी और फिर उसमें और दीदी में बहुत कम संपर्क रहा था। वह कनाडा आ गई थी और दीदी दुबई में थीं। फ़ोन पर भी कभी-कभार ही बातचीत होती थी दोनों में।

सारा दिन ऐसे ही बीता। एक अजीब सी ख़ामोशी में। वह दीदी से जो पूछना चाहती थी, पूछ नहीं पा रही थी। रात को माँ के अपने कमरे में चले जाने के बाद मधूलिका अपने दीदी के साथ कमरे में सोने गई। बचपन से ही दोनों इस कमरे में सोते थे, एक साथ। भैया का कमरा अलग था और काफ़ी सालों से पापा बाहर वाले कमरे में बिस्तर लगा कर सोते थे। मधूलिका कभी-कभी माँ के साथ सो जाया करती थी उनके कमरे में। मधूलिका ने ही बात शुरू की।

"दीदी, सुदर्शना कौन है? पापा की डायरी से उनकी तस्वीर मिली, पापा की बनाई हुई, और उनका एक ख़त मेरे नाम। पापा ने उनसे शादी की थी? कब? और मुझे यह सब पता नहीं चला, कैसे? क्या आपको पता था?"

दीदी उसके पास आकर बिस्तर पर बैठ गई। प्यार से उसके पीठ पर हाथ रखा और कहा, "छोटी तू बहुत ख़ुशनसीब है जो तुझे इन बातों का पता नहीं चला। मेरे बचपन का ख़ून हो गया था पापा के इस रिश्ते की वज़ह से।"

"क्या बात थी दीदी? पापा का कोई ऐसा रिश्ता था यकीन नहीं होता। पापा जो मम्मी को इतना प्यार करते थे...फिर कैसे?"

दीदी बताने लगीं। "उस रात को मैं भूल नहीं सकती जब सुदर्शना का फ़ोन आया था माँ के पास। बहुत गुस्से में थी वह और माँ से अनाप-शनाप बोल रहीं थीं। उसका पापा से कोई झगड़ा हो गया था और वह गुस्से में माँ से बोल रही थी कुछ। मुझे ठीक से कुछ समझ नहीं आया था। माँ ने बाद में मुझे बताया था कि सुदर्शना पापा की दोस्त थीं। उस वक़्त सिर्फ़ चिट्ठी-पत्री का संपर्क था दोनों में। माँ को उनके पत्रों के बारे में पता था। किसी पत्रिका के ज़रिये दोनों की मुलाकात हुई थी। मगर बात बढ़ते-बढ़ते भावनात्मक संपर्क तक पहुँच चुकी थी और पापा ने एक दिन माँ से कह दिया था कि यह रिश्ता दोस्ती से बढ़ कर हो गया है।" मधूलिका हैरानी से यह सब सुन रही थी। माँ दीदी की हमेशा ही करीब रहीं थीं। माँ जब १७ साल की थीं, तभी दीदी हो गईं थीं। उम्र के कम फ़ासले की वज़ह से माँ और दीदी सहेली जैसी थीं।

"मगर चिट्ठी-पत्री का रिश्ता भला कितना मज़बूत हो सकता होगा, यही सोचा था माँ ने भी शायद," दीदी बता रहीं थीं। "मुझे याद है माँ बहुत रोईं थीं और पागलपन की हद तक हरकतें की थीं उन्होंने। मैं उनके बीच में नहीं पड़ना चाहती थी। मेरा दिमाग जैसे काम ही नहीं कर रहा था। मगर फिर मैंने पापा को माँ को मनाते हुये भी सुना था अपने कमरे से। सब कुछ सामान्य हो गया था उस दिन और मुझे लगा था कोई आँधी आ कर चली गई मगर हमारा घर बच गया। पापा और मम्मी को लड़ते या माँ को इस तरह की हरकतें करते कभी नहीं देखा था मैंने पहले, वह भी मेरे सामने। यह उस गर्मी की बात है जब तू और भैया राजकोट बुआ के घर गये हुये थे।"

"फ़ोन के दिन की घटना के बाद फिर धीरे-धीरे बातें सामान्य हो गईं। माँ को और मुझे लगा कि सब ठीक हो गया। पता नहीं फिर कैसे पापा और उस औरत में फिर बात शुरू हुई होगी। दो-तीन महीने सब ठीक चला था। तब तो तुम सब भी घर में ही थे, किसी को कुछ पता नहीं चला। मुझे याद है, पापा एक दिन माँ को डाक्टर के पास भी ले कर गये थे। अल्ट्रासाउंड के लिये। मैं समझ रही थी कि माँ क्यों जा रही हैं अल्ट्रा साउंड के लिये। दिल में डर था कि कहीं फिर मुझे शर्मींदगी न उठानी पड़े, पर फिर एक हर्ष भी था मन में कि माँ और पापा का अगर इस तरह रिश्ता अच्छा होता है तो यह कोई गलत नहीं। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। एक दो महीने बाद मैंने माँ को फिर तनाव में देखा था। और उस दिन पापा के लिये लिखी एक चिट्ठी मेरे हाथ में पड़ गई थी। सुदर्शना की चिट्ठी। मुझे उस चिट्ठी को पढ़ कर यकीन हो गया था कि पापा और सुदर्शना में सिर्फ़ ’दोस्ती से बढ़ कर’ नहीं, उस से भी बढ़ कर रिश्ता है। सुदर्शना और पापा मिल चुके थे और उन्होंने मिल कर शादी भी की थी। मगर घिनौनी बात मुझे यह लगती थी कि सुदर्शना पहले से शादीशुदा थी और पापा भी हम सब के साथ थे। कैसे कोई औरत अपने एक पति के रहते दूसरे से शादी कर सकती है। क्या वह शादी हुई?"

कुछ असंजस की स्थिति थी, कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ सी मधूलिका ख़ुद को सम्हालने की सी कोशिश कर रही थी। पापा का किसी और औरत से भावनात्मक संपर्क या शारीरिक संपर्क, कुछ भी सहन नहीं हो पा रहा था उसे। पापा तो उसके आदर्श रहे थे। यह कैसे हुआ होगा। क्या आश्चर्य है कि दीदी पापा से नफ़रत करती हैं और उनके मृत्यु के समय भी नहीं आईं थीं। दीदी के आँखों में आँसू थे और जैसे यह सब बताते हुये वह होश में नहीं थीं। जिस बात को वह कभी किसी से कह नहीं पाईं और जिस बात के लिये उन्हें हमेशा ही शर्मिंदगी का अहसास रहा, आज वह बाँध खुल रहा था। स्वाभाविक था कि प्रवाह बहुत तेज़ था।

"मैं आज भी उस औरत से घृणा करती हूँ और पापा से नफ़रत। दो साल बाद मेरी शादी हो गई और मैंने तय कर लिया कि मैं अब माइके नहीं आऊँगी। माँ की ख़बर मिल जाती थी कि वह ठीक हैं तो मैं भी संतुष्ट हो लेती थी। बाद में भैया ने भी शादी कर ली। माँ ने बहुत सहा है। उन्होंने पूरी ज़िंदगी दे दी हमारे लिये, पापा के लिये, और क्या मिला उन्हें? कुछ नहीं!" दीदी रो रहीं थीं।

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