अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.14.2014


न्याय-अन्याय

5.

 "भैया आपसे बात करनी है," रात को सोने जाने से पहले उसने भैया से कहा। भैया बहुत थके लग रहे थे। मगर बात करना ज़रूरी था। वरना वह आज रात सो नहीं पायेगी। जीवन भर सो नहीं पायेगी। यह एक ऐसी गुत्थी है जो वह कभी ख़ुद नहीं सुलझा पायेगी।

"हाँ बोल," - का छोटा सा उत्तर दिया भैया ने।

"बात कुछ गंभीर है भैया, समय लगेगा।"

"हम्म्म, क्या बात है?"

"भैया यह ...यह सुदर्शना क्या बला है? कौन है यह औरत?" उसके मुँह से बात जैसे छूट गई। असम्मान के साथ कही हुई अपनी बात पर उसे दु:ख नहीं था।

भैया ने एक पल को उसे देखा और कहा, "उनके लिये सम्मान से बात करो छोटी। वे तुमसे बड़ी हैं और माँ जैसी," मधूलिका को भैया छोटी ही कहते थे। "जिस बात को पूरा नहीं जानती हो, उसके बारे में कुछ कहो नहीं। बस इतना जान लो कि उस औरत की ही वज़ह से आज मैं ज़िंदा हूँ और माँ का समाज में सम्मान है। माँ कभी माफ़ न करें उन्हें मगर हम बच्चों को उनसे असम्मान से बात करने का कोई अधिकार नहीं। तुम जो थोड़ा जानती हो अब उनके बारे में, तो बस वहीं तक जानो। इससे आगे मुझसे और बात नहीं करना।" यह कह कर भैया अपने कमरे में चले गये।

मधूलिका ने भैया को इतने गंभीर रूप में कभी नहीं देखा था। उसे जानना था उस औरत के बारे में। किसे मालूम है उसके बारे में। कब मिले पापा उस से? कैसे? क्यों शादी कर के भी शादी नहीं की होगी पापा ने उससे? और वह खु़द भी तो विवाहिता थी फिर क्या वज़ह थी कि वह अपने पति को छोड़ नहीं पाई। और भैया आज उनकी वज़ह से ज़िंदा हैं? यह कौन सी पहेली है? उसे लग रहा था कि उसका दिमाग़ फट जायेगा। अचानक उसका सर ज़ोर से दर्द करने लगा। कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। माँ के साथ नहीं सोयेगी आज वह। सभी जैसे एक नाटक कर रहे हैं। उस से तो बरसों से छुपा कर रखा सबने इतना बड़ा राज़। सब जैसे पराये लगने लगे थे उसे। वैराग्य सा उत्पन्न होने लगा था उसके मन में। अपने कमरे में जा कर लेट गई मधूलिका।

सुबह दीदी के फ़ोन की घंटी से उसकी नींद खुली। अचानक उठ कर उसे पिछले दिन की सारी बातें याद आ गईं। पापा का चला जाना और फिर यह सब ... मधूलिका को सब जैसे एक सपना जैसे लगने लगा। दीदी की आवाज़ सुनते ही जैसे सब टूट पड़ा। वह ज़ोर से रो पड़ी। उधर से दीदी की आवाज़ आ रही थी, "क्या हुआ छोटी? सब ठीक है न? माँ कैसी हैं?" मधूलिका ने अपने को संभाला और रोते-रोते ही कहा, सब ठीक है...यह सुदर्शना कौन है दीदी? पापा ने उससे शादी की थी? पापा ने माँ को छोड़ दिया था? यह कौन है?" दीदी की आवाज़ बंद हो गई। और फ़ोन कट गया। मधूलिका बिस्तर पर बैठ कर रोती रही। पाँच मिनट बाद दीदी का फ़ोन फिर आया। मधूलिका ने ही फ़ोन उठाया। दीदी धीमी आवाज़ में कह रहीं थीं, " छोटी, सोचती हूँ अगले हफ़्ते आ जाऊँ। माँ के लिये मन ख़राब हो रहा है। और तुझसे कई बातें भी करनी हैं।"

एयरपोर्ट पर भैया ही गये थे दीदी को लेने। मातम पर मातम छाया हुआ था। पापा ने माँ को धोखा दिया? मगर क्यों? और वह औरत? वह जब शादीशुदा थी तो फिर क्या वज़ह थी? सवालों की लंबी कतार जमा हो रही थी उसके दिमाग में। सब का हल मिल जाये उसे।

1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें