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ISSN 2292-9754

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07.14.2014


न्याय-अन्याय

3.

 दीदी पापा के चले जाने के दो दिन बाद पहुँचीं थीं। माँ से लिपट कर ख़ूब रोई थी दीदी। उससे भी गले लग कर दीदी ने प्यार किया था। मनोज ख़बर सुनते ही सिंगापुर से सीधे आ गये थे। मनोज का सहारा कितना सुकून देता है उसे। प्यार की अभिव्यक्ति नहीं रही है कभी मनोज की उस तरह से कभी, पर हमेशा ही ज़रूरत के समय वे रहे हैं पास। मगर कंपनी का काम ऐसा है कि मनोज बहुत समय भी नहीं दे पाते हैं मधूलिका को। आज ही बस मनोज भी निकल जायेंगे वापस कनाडा। १३ वीं के बाद सभी मेहमान चले गये थे। मधूलिका अभी एक महीने माँ के साथ रहना चाहती है। माँ पापा के बिना कैसे रहेंगी उसे समझ नहीं आ रहा था। जीवन क्षणभंगुर है, कुछ दिन पहले तक ही तो सब कुछ ठीक था । आज अचानक जाने क्या हो गया। सब कुछ कितना व्यर्थ लगने लगा है। आज शाम को मनोज के निकल जाने के बाद वह एकांत में माँ के साथ समय बिताना चाहती है। माँ से ठीक से बात ही नहीं हुई है पापा के चले जाने के बाद। दीदी और जीजाजी आ कर दो दिन बाद ही चले गये थे। पापा के जाने के बाद से ही माँ गुमसुम सी रही हैं। किसी से भी ठीक से बात नहीं की है उन्होंने उसने ध्यान दिया है। आज वो खुल के बात करेगी माँ से। भैया से भी तो ठीक से बात नहीं हुई है उसकी। सभी इतने व्यस्त रहे हैं इन दिनों।

रात को आज पहली बार माँ और भैया के साथ खाना खाया उसने। "माँ, एक और रोटी ले लो।" का जवाब माँ ने न दे कर अपना प्लेट उठाया और उठ कर चली गईं। भैया चुपचाप खा रहे थे। मधूलिका पूछ बठी, "माँ को क्या हो गया है भैया? पापा के जाने का सदमा इस तरह बर्दाश्त न कर पाईं तो ख़ुद भी कितने दिन जीयेंगी वो?"

भैया ने पूछा, "तू कब जा रही है?"

"अभी एक महीने और रहने का सोच रही हूँ। मनोज भी बाहर बाहर ही रहते हैं। मैं भी जा कर क्या करूँगी वापस?.. क्यों?"

"नहीं, ठीक है...मैं कल ऑफ़िस ज्वाइन कर रहा हूँ," भैया ने छोटा सा उत्तर दिया।

रात को मधूलिका माँ के पास सोने आई। उसने देखा माँ बिस्तर पर बैठी कोई किताब सी पढ़ रही थी। कमरे में कुछ अंधेरा सा था। मधूलिका को देखते ही माँ ने वह डायरी छुपा ली। मधूलिका ने आश्चर्य से पूछना चाहा, मगर कुछ सोच कर चुप रह गई। माँ को जा कर उसने प्यार से गले लगाया। माँ के शरीर की ख़ुश्बू उसे अभी भी बहुत अच्छी लगती है। गुलाब की सी...बचपन से ही जैसे उसमें रची-बसी हुई है। पर पापा को कहते सुना था उसने एक बार माँ से कि वह साबुन लगा कर नहाया करें। और उसे लगा था कि माँ के शरीर से तो वैसे ही गुलाब जैसी ख़ुश्बू आती है, पापा क्यों उन्हें साबुन लगाने को कह रहे हैं। पापा हमेशा ही रोबदार रहे थे, बचपन में वह ख़ूब डरती थी पापा से। पर धीरे-धीरे उसका वह डर जाता रहा था। पापा कब धीरे-धीरे दोस्त बन गये थे उसके उसे मालूम नहीं चल पाया था। बचपन से माँ को उसने गुड़ाकू लगा कर मंजन करते हुए देखा था। मंजन के बाद माँ के मुँह से गुड़ाकू की ख़ुश्बू भी उसे बहुत अच्छी लगती थी। उसने एक बार कहा था पापा से कि वह भी मंजन करना चाहती है गुड़ाकू से। पर पापा ने बहुत ज़ोर से डाँट दिया था उसे। घर में बस माँ ही ऐसे मंजन करती थीं।

वह माँ के गोद में लेट गई। माँ ने उसके सर पर धीरे से हाथ फेरा। थोड़ी देर चुपचाप लेटे रहने के बाद मधूलिका ने माँ से पूछा,

"माँ, मेरे साथ चलोगी? अच्छा लगेगा.."

माँ ने उसके सर पर फिर से हाथ फेरा। कहा कुछ भी नहीं।

"कहो न माँ.."

माँ ने उल्टा प्रश्न किया,

तू कैसी है बेटा? मनोज अच्छा लड़का है न? तुझे प्यार तो करता है न?"

मधूलिका ने एक पल चुप रह कर कहा,

"माँ चलो न, ख़ुद ही देख लेना मेरा संसार।"

माँ ने जैसे एक बड़ी सी साँस ली। बुदबुदा कर कुछ कहा। शायद,

"क्या पता चलता है...?"

अपनी शादी से पहले वह माँ को कई बार ऐसे ही बुदबुदाते सुनती थी, पर उसे समझ नहीं आता था कुछ। फिर माँ ने ज़रा तेज़ आवाज़ में कहा,

"न रे, तेरे पापा यहीं रहे न, उन्हें छोड़ कर कैसे जाऊँ, बता।" माँ और पापा का प्यार उसे हमेशा ही आदर्श लगा है। वह रो पड़ी। माँ ने फिर उसके सर पर फिर से हाथ फेरा। माँ को पापा के जाने के बाद उसने रोते नहीं देखा था। वह उठ कर माँ के पास बैठ गई। माँ, तुम रोती क्यों नहीं? पापा चले गये माँ। माँ ने उसकी ओर देखा और कहा,

"बेटा, तू अभी रहेगी न?"

"हाँ, माँ।"

अगले दिन सुबह उसने दीदी को फ़ोन किया। दीदी के साथ फ़ोन पर वह रोई और पूछा भी कि वह इतनी जल्दी क्यों चली गईं? दीदी ने कोई जवाब नहीं दिया। मधूलिका बहुत अकेला महसूस कर रही थी। भैया भी ऑफ़िस जा चुके थे और माँ पूजा-घर में थीं। साईं बाबा की बड़ी सी मूर्ति के आगे कई सालों से उसने माँ को सर झुकाये जाने कितने-कितने घंटों देखा है। कोई दस साल पहले वह एक मेले से माँ के लिये एक छोटी सी बाबा की मूर्ति उठा लाई थी। वह छोटी मूर्ति अब बढ़ते-बढ़ते बड़ा आदम कद रूप ले चुकी थी। उसे भी साईं के सामने सर झुका कर बड़ी शांति मिलती थी। वह पूजा घर में जा कर माँ के पास बैठ गई। थोड़ी देर बैठ कर फिर माँ के कमरे में चली गई। माँ की अलमारी खोल कर माँ की पुरानी साड़ियाँ देखने लगी। माँ की अलमारी की गंध उसे बचपन से ही पसंद है। वह बचपन से ही माँ की साडि़याँ टटोलती रही है। अब इन साड़ियों का क्या होगा। कुछ वह साथ ले जायेगी। दीदी ने कुछ भी ले जाने से मना कर दिया है। अलमारी अनमने ढंग से बंद कर वह माँ के बिस्तर पर बैठ गई। माँ का तकिया अपनी गोद में ले कर वह फिर से फूट-फूट कर रो पड़ी। पापा आप क्यों चले गये, पापा। उसके मुँह से बार-बार यही निकल रहा था।

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