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ISSN 2292-9754

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07.14.2014


न्याय-अन्याय

1.

अपने घर के बगीचे में नई उगी नर्म घास पर लेट कर मधूलिका आसमान को देख रही थी। तारे गिनने की उसकी बचपन की आदत अभी भी छूट नहीं पाई थी। बचपन में पापा के पास छत पर चारपाई पर लेट कर वह बताया करती थी पापा को कि कितने तारे गिने उसने।

"रोज़-रोज़ तारे अपनी जगह क्यों बदल लेते हैं पापा?"

"तुमसे आँख-मिचौली खेलते हैं। तुम्हारे दोस्त हैं न..."

पापा की बहुत याद आती है उसे। शादी को तीन साल हो गये हैं। और मनोज का काम कुछ ऐसा है कि अक्सर ही वे ऑफ़िस के काम से टूअर पर रहते हैं। मनोज की नौकरी सेल्स की है। उनका देश विदेश में टूअर लगता ही रहता है। कभी-कभी दो महीने के लिये घर नहीं होते हैं मनोज। मधूलिका भी एक छोटी सी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का पार्ट टाइम काम करती है। वैंकूवर शहर बहुत ख़ूबसूरत है। मगर सारे दिन टिप-टिप बारिश की वज़ह से जैसा उसका मन भी भीगा होता है हर वक़्त, और ऐसे में ही बेवज़ह आँखें भी भीग जाया करती हैं उसकी अक्सर ही। दोपहर बाद उसकी छुट्टी होती है। बचपन से ही उसे चित्रकारी का शौक है जिसे वो अपने ख़ाली समय में पूरा करती है। चित्रकारी का शौक़ पापा से ही मिला था उसे। पापा ने कभी किसी से सीखा नहीं था, मगर उनके बनाये पोट्रेट बिल्कुल सजीव होते थे। माँ को कभी नहीं उतारा था कैनवस पर पापा ने। हाँ उसकी, दीदी और भैया के एक दो स्केच ज़रूर बनाये थे। कल ही एक पेंटिंग ख़त्म की थी उसने। एक चिड़िया का घोंसला। एक जोड़ा चिडियों का, अपने बच्चों की रखवाली करता हुआ। हर पेंटिंग में कहीं उसे अपना बचपन या अपने माता-पिता की छवि दिखती थी। उसने अपने माँ-पापा जैसा अच्छा जोड़ा नहीं देखा था। पापा माँ को अपनी हथेली पर रखते थे। माँ को कभी कोई तकलीफ़ नहीं होने देते थे। ऐसा नहीं था कि पापा को माँ के आगे पीछे घूमते देखा हो उसने या कभी मम्मी-पापा को बहुत प्यार करते देखा हो। जब से वो बड़ी हुई थी, तब से तो उसने मम्मी पापा को एक कमरे में सोते भी नहीं देखा था। पर उनका एक दूसरे के लिये सम्मान और प्यार जैसे घर की हवा में बसी हुई होती थी। माँ को अक्सर ही माइग्रेन की शिकायत भी रहती थी। मगर पापा के चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं देखी थी उसने। माँ पापा पर पूरी तरह निर्भर थीं। जब वो मनोज को देखती है तो उन्हें अपने पापा से कितना अलग पाती है वह। मनोज उससे कहते हैं कि अपने पाँव पर खड़े हो। अब बड़ी हो जाओ। मैं तुम्हारा पापा नहीं हूँ। सच उसके पापा जैसा अच्छा दोस्त भी नहीं हुआ कभी उसका कोई। स्कूल-कालेज की बातें माँ को सुनाने जाती तो माँ पापा के पास भेज देती थीं। पापा बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनते थे। शादी भी सिर्फ़ पापा के कहने पर ही की थी उसने वरना अभी उसे शादी की इच्छा नहीं थी। वो चित्रकारी में एक डिग्री लेना चाहती थी। मनोज का रिश्ता आने पर पापा ने ही उसे समझाया कि ये डिग्री वो शादी के बाद भी ले सकती है। और विदेश में तो और भी कई मौके मिलेंगे। उसकी शादी के वक़्त पापा बिल्कुल नहीं रोये थे। मगर बाद में माँ ने उसे बताया था कि पापा कितनी रातें सो नहीं पाये थे। अपनी प्रिय छोटी बेटी की शादी की ख़ुशी और उसके चले जाने का ग़म, शायद दोनों का असर रहा हो। आज घास पर लेटे-लेटे फिर पापा की याद आ गई उसे।

"क्रीं क्रीं" की आवाज़ से मधूलिका की तंद्रा भंग हुई। इस वक़्त सिर्फ़ मनोज का ही फ़ोन हो सकता है। जब मनोज बाहर होते थे तो वो कॉर्डलेस फ़ोन पास ले कर ही सोती थी। मनोज का फ़ोन कभी भी आ जाता है।

"हलो...हलो...आई कैन नॉट हीयर यू"..."हाँ, आप कौन? ...क्या?..... कैसे?....क्या...." उसके आगे वो कुछ कह नहीं पाई...एक क्षण को वो किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी रही। पापा को हार्ट अटैक आया था। कोई महिला थीं फ़ोन पर जिसे वो नहीं जानती थी। शायद पड़ोस में कोई नया आया है। ख़ैर, उसे कल ही निकलना होगा। मनोज भी नहीं थे...वह क्या करे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी आज पापा इतना याद आ रहे थे उसे। बाहर से अंदर आ गयी मधूलिका। आँखों से पानी बहना शुरू हो गया था। और अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। मनोज को फ़ोन किया उसने मगर मनोज अभी सिंगापुर में थे। मीटिंग में बिज़ी होंगे, तभी फ़ोन मेसेज पर गया। मेसेज छोड़ा उसने, "मनोज, इमर्जेंसी है, फ़ोन करो।"

२४ घंटे प्लेन में चौबीस साल जैसे लग रहे थे मधूलिका को। उसे वैसे भी प्लेन का अकेले का सफ़र अच्छा नहीं लगता था, और फिर ऐसी परिस्थिति में उसे सब कुछ जैसे व्यर्थ सा लग रहा था। प्लेन में किसी से कोई बात नहीं की उसने। उसका मन उसे अतीत में ले जा कर बार-बार फेंक देता था। स्कूल में पापा का उसे पहुँचा आना, उसके कालेज पहुँचने पर उसे लेने आना, जाने कहाँ-कहाँ उसके साथ उसकी स्नातकोत्तर के भर्ती के लिये परीक्षायें दिलवाना, कभी बस उसकी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिये मम्मी को साथ ले कर आधुनिक सलमान ख़ान की सिनेमा देखने जाना, उसकी कक्षा दसवीं की परीक्षा के बाद उसके साथ गणित का पूरा पर्चा हल करना...। परीक्षायें आते ही वो जाने क्यों बीमार हो जाया करती थी। और हर बार पापा ही उसके साथ होते थे...रात को कई बार पापा उसके साथ जागते भी थे। वैसे बचपन से पापा के साथ उसका रहना बहुत नहीं हुआ था। नौकरी के सिलसिले में पापा सालों बाहर रहते थे। बीच-बीच में आते थे पापा तो जैसे पापा को पाकर वो एक मिनट भी उन्हें आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहती थी।

पापा अपनी माता जी से बहुत प्यार करते थे। एक दुखद हादसे में उनके माता जी का देहांत हो जाने के बाद पापा के कई सपने पूरे नहीं हो पाये थे। घर में आग लग जाने की वज़ह से अपनी माँ की अचानक मौत से पापा को उबरने में एक अर्सा लगा था। पापा उस वक़्त कई परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, मगर उस के बाद पापा उन परीक्षाओं को कभी दे नहीं पाए। एक टीचर की नौकरी से ही गुज़ारा होता था। पापा जो भी करते थे हमेशा दिल से। जो कह दिया होता था बस वो जैसे पत्थर की लकीर। बचपन से ही उसे पता था कि अगर पापा ने कहा है तो ज़रूर होगा। पापा को असत की राह पर चलते नहीं देखा था कभी उसने। उसके आदर्श थे पापा।

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