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01.01.2016


मेरी कविता

 एक क़दम बढ़ाते ही,
भरभरा कर बिखर जाती है कविता,
स्वार्थांधता, क्षोभ और अहंकार से,
सहम जाती है कविता,
ईर्ष्या, कड़वाहट और –
जीवन की विषमताओं के अँधेरे में,
भटक जाती है कविता,
कविता, जो अब रही ही ना मुझमें,
किसी ने बड़ी बेरहमी से,
निचोड़ ली मेरे अंतस की सारी कविताएँ,
और छोड़ दिया मुझे –
अकेले जीवन के महासमर में,
सहने को अनन्त यातनाएँ,
अब कानों में यों ही किसी के...
फुसफुसाने की आवाज़ नहीं आती,
ना कोई परिचित गंध, साँसों से आकर टकराती है,
अब तो अनगिनित
शोर, संतापों और प्रताड़नाओं के,
नीचे दफ़न हो जाती है कविता,
कितनी कोशिशें करता हूँ कि,
संजोकर, सहेजकर रख सकूँ उन सारे अक्षरों को,
जो मुस्कुराहट भरते हैं -
मेरी कविताओं में,
मगर आत्मग्लानि और
पश्चताप के आँसुओं में,
बह जाती है कविता,
लाख जतन करता हूँ कि,
मुरझाने से बचा लूँ अपनी कविता को,
मगर भय, भूख और दरिद्रता के लू में,
झुलस जाती है कविता।


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