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07.15.2016


मैं कवि नहीं हूँ

कविताएँ मर्मस्पर्शी होती हैं,
जीवन के हर रंग की अरुषि होती है,
भावुकता व विद्रोह की अभिव्यक्ति होती है,
समाज को सही दिशा दिखाने की -
एक कोशिश होती है,
शिल्‍प,सृजन व सौंदर्य से विभूषित,
कविताएँ,
कुरूपता नहीं सह पातीं,
विकृति व विरूपित मानसिकता नहीं सह पातीं,
बिखर जाती है कविता!

लोग पढ़ते हैं कविता,
गुनगुनाते भी हैं इसे,
भावों को समझ भावुक होते हैं,
मेरी कोशिशें अधूरी हैं शायद,
गढ़नी नहीं आती ऐसी कविता,
या शायद मैं कवि नहीं,
स्वयं कविता हूँ,
जो लिखता हूँ वो,
उन कविताओं का भावार्थ होता है,
और इन सभी अर्थों को जोड़ कर देखो,
सबका मतलब सिर्फ़ एक है,
कि मैं कविता क्यूँ हूँ?


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