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12.02.2014


माँ भी झूठ बोलती है

माँ भी झूठ बोलती है,
कभी अपने बच्चे की ख़ुशी के लिये,
उसकी तारीफ़ करती,
कभी किसी गैर से अपने बच्चे के बारे में,
कुछ अच्छा कहती,
अपनी तसल्ली के लिये झूठ बोल जाती है माँएँ,

अपने बच्चे की उम्र को कम-ज़्यादा करती,
दूसरों के बच्चे से तुलना करती,
अपने बच्चे को मेहनती, कर्मठ और
नेक-दिल साबित करती,
उसकी गलतियों को छुपाती,
अभी तो उम्र ही क्या है? कह
झूठ बोल जाती है माँएँ,

रोज़-रोज़ की ज़िंदगी में,
झूठ क्या और सच क्या,
वगैर इसका परवाह किये,
बिल्कुल निर्मेष भाव से झूठ बोल जाती है माँए,

कभी अपनी झूठ पकड़े जाने पर,
लोगों के सामने,
कुछ शर्मिंदा सी, कुछ झेंपी सी,
कुछ ख़ुद को सीधी सी दिखाने के प्रयास में,
अक्सर झूठ बोल जाती है माँए,

कभी ऐसी स्थिति में,
अपने बच्चों के सामने, अपने पति के सामने,
आँसू के दो-चार बूँद टपका कर,
मामला को रफा-दफा करती,
इस माँ के आँखों को देखा है कभी?
इन आँखों में बचपन से जवानी तक,
और जवानी से बुढ़ापे तक,
ना जाने कितने मंजर छुपे हुए हैं,
कितने आशा-निराशा, तृप्ति-अतृप्ति,
अधूरी अभिलाषाएँ, अधूरे सपनों,
और अध-जागी रातों से,
आँखों के चारो ओर पड़े काले घेरे को,
छुपाती मुस्कुरा भी देती है माँएँ!


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