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04.02.2014


क्या तुम नहीं हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में

मन बहुत उदास है आज- कल,
फिर तुम्हारी यादों के सर्द हवाओं ने जकड़ लिया है मुझे,
क्या माँग लिया था मैंने तुमसे? जो तुम दे ना सके,
थोड़ी सी धूप, थोड़ी सी साँसें, थोड़ी सी ज़िंदगी, थोड़ी सी मुस्कुराहट!
क्या ये सब बहुत ज़्यादा था तुम्हारे लिए?
क्या तुम यही चाहती थी की मैं उड़ता रहूँ,
पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह
बेजान, नीरस और उदास,
पिछले कई साल से मुस्कुराया नहीं,
बस हँसे जा रहा हूँ बेजान- सी-हँसी,
लोगों के भद्दे मज़ाक, बर्दाश्त किए जा रहा हूँ,
हर वक़्त, बस यही सवाल ज़ेहन में बार-बार आए जा रहा है,
क्या मैं यही चाहता था?
क्या मैं सच में अपने प्राणों कि आहुति देना चाहता था?
इतना हॄदयशून्य कैसे बन पाया मैं?
हर वक्त आँखों से आँसू के कुछ बूँदें बहने को आतुर,
अपना ही चेहरा ख़ुद, पहचान नहीं पा रहा,
कैसे मार दिया मैंने ख़ुद अपनी आत्मा को?
मैं जानता हूँ, तुम्हे शायद परवाह नहीं, कभी था भी नहीं,
बस एक कच्चे धागे सा बंधन था,
जिसे ज़बरदस्ती मैं ही निभाये जा रहा था,
शायद वो धागा टूट गया,
तुमने बड़ी आसनी से, समेट लिए अपने हिस्से के धागे,
पर मैं अभी भी उलझा हूँ,
अपने हिस्से के उलझे धागों को समेटने में,
बार-बार एक ही सवाल गूँज रहा है, मन में,
क्या तुम नहीं हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में?........


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