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07.15.2016


अनगढ़ कविता

मैं तो सदा,
लिखता रहा सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर,
ताकि तुम पढ़ सको मुझे,
ढूँढ सको कोई रोशन जगह,
मेरे मन के अँधेरे कोने में,
दे सको आकार,
मेरी अनगढ कविताओं को,
सींच सको, अपने नम होठों से,
मेरे निर्जन, बेजान पडे जीवन को,
सिखा सको मुझे जीना,
रंग भरना जीवन में,
मैं तो सदा लिखते रहा,
ताकि देख सकूँ,
तुम्हारी आँखों में चमक, लबों पर हँसी,
सुन सकूँ तुम्हारे ज़ुबां से,
"पगले हो तुम बिल्कुल"
जान सकूँ तुम्हारी वो चाहत,
कि फ्रेम करा कर रख लेना चाहती हो,
मेरे हर शब्द को, मेरी लेखनी को,
मेरे शब्दों ने ही तोड दिये शीशे सब फ्रेम के,
शब्द के इस दोगले चरित्र को,
समझा ही नहीं,
इसलिये आज भी लिखे जा रहा हूँl


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