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01.01.2016


ऐसा क्यों होता है

ऐसा क्यों होता है कि,
मेरे जीवन के घोर निराशा,
और नाउम्मीदी के पलों में भी,
रोशन हो जाती नामालूम उम्मीद की किरणें,
जब तुम्हें सोचता हूँ,
बरबस ही मेरे होंठों पर खिल जाती है,
एक मुस्कुराहट (जो ना जाने कब से रूठी होती है),
जब याद आती है मेरे जीवन की,
कुछ ऐसी बातें जो -
मैं सिर्फ तुम्हें बताना चाहता था,
मेरे क़दमों मे अचानक से तेज़ी आ जाती,
जैसे मेरे ऊपर से कई मन का बोझ
हटा दिया गया हो,
जब पूछ लेती हो कभी भूले से ही
हाल-चाल मेरा,
ना जाने कहाँ से आ जाता है मुझमें,
इतनी जोश, इतना उत्साह,
कि सब कुछ इतना असान सा लगने लगता है,
लगने लगता है कि
कुछ भी मुश्किल नहीं है पाना जीवन में,
अगर पूछ लेती हो एक बार
मेरे काम के बारे में,
ऐसा क्यों होता है कि,
मेरे ख़्यालों में बार-बार ये आता है कि,
पा सकते थे सब कुछ,
अगर तुम्हारा साथ मिल जाता,
और ये सोच कर दिल बैठ सा जाता है,
कि अब क्या होगा कुछ पाकर,
अगर तुम साथ ही ना हो,
क्या तुम्हें नहीं लगता कि शायद कुछ बाक़ी है,
हम दोनों के बीच,
जिसे ठीक किया जा सकता है।


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