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07.15.2016


खो गई हैं मेरी कविताएँ कहीं

ढूँढ रहा हूँ अपनी कविताओं को,
भाड़े के कमरे के कोने-कोने में,
जहाँ कमरे के बाहर –
खोले गए चप्पलों की संख्या के हिसाब से,
बढ़ जाता है किराया हर माह,

ढूँढ रहा हूँ अपनी कविताओं को,
चावल, दाल और आटे के खाली कनस्तरों में,
बेटी के दूध के बोतल में,
जिसमें तीन चौथाई पानी मिला है,

ढूँढ रहा हूँ अपनी कविताओं को,
पत्नी के बेबस आँखों में,
माँ की कराहों में,
"अपने साहब" के गुर्रहटों में,
परिजनों के रहमहीन उद्गारों में,

ढूँढ रहा हूँ अपनी कविताओं को,
कुछ भूले-बिसरे दोस्तों के साथ –
गुज़ारे उन ख़ूबसूरत पलों में,
जो ग़लती से भी मय्सर नहीं होते अब…
एक पल के लिए भी!

अभी-अभी तो दिखी थीं कविताएँ,
जब सोच रहा था उसकी बातें,
जो कभी मेरी हर ख़ुशी की वजह हुआ करती थी,
उसकी निश्छल मुस्कुराहटों में,
गुम हो जाते थे सभी ग़म और दुःख की छाया भी,
पर बदले हालात में…
बदली उसकी मुस्कुराहटों में,
गुम हो गई मेरी कविताएँ फिर से,
ढूँढ रहा हूँ अपनी कविताएँ।


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