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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


हँसना झूठी बातों पर

नयनों में छायी तृष्णा,
सूनापन मन के जज़्बातों पर,
धीरे-धीरे सीख गये हम,
हँसना झूठी बातों पर,

कपट भरी इस दुनिया में,
रिश्तों को बँटते देखा हमने,
प्रेम की माला का मोती,
एक-एक कर झरते देखा हमने,
कल तक जो सब अपने थे,
वो आज बेगाने लगते हैं,
प्यार भी बँटकर रह गया,
बस अवसर के अनुपातों पर,
धीरे-धीरे सीख गये हम,
हँसना झूठी बातों पर,

देखा हमने,
औरों की पीड़ा पर,
लोगों को ख़ुश होते,
अपने हित की ख़ातिर,
दूजों के पथ में कंटक बोते,
पावन-सरस वैदेही को,
जीवन के दुःख सहते,
प्रेम-दीवानी मीरा को,
विष की हाला पीते,

निष्ठुर इंसानी दुनिया की,
निर्मम इन सौगातों पर,
धीरे-धीरे सीख गये हम,
हँसना झूठी बातों पर।


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