अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.14.2016


हमको सपने सजाना ज़रूरी लगा

तुम मिली जब मुझे दुनिया की भीड़ में,
अपनी सुध-बुध गँवाना ज़रूरी लगा,
आस जागने लगी प्रीत की शब तले,
हमको सपने सजाना ज़रूरी लगा,

नींद छिनी रात की दिन का चैन लूटा,
हाल तुमको बताना ज़रूरी लगा,
चाहत की गलियों में हाँ संग तेरे,
प्रेम दीपक जलाना ज़रूरी लगा,

तेरे पहलू में सर को रख कर,
हमें कुछ सुनना-सुनाना ज़रूरी लगा,
बात जब ये ख्वाब में मिलने की,
हमको पलकें झुकाना ज़रूरी लगा,


राधा बन आई तुम यमुना तीर पर,
तेरी पायल छनकना ज़रूरी लगा,
रास फिर से रचा, वंशीवट के तले,
हमको बंसी बजाना ज़रूरी लगा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें