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12.12.2008
 

पुत्रवती भव 
मनोज तिवारी


 दोपहर के तीन बज रहे थे आफिस में निशा की मीटिंग काफी देर तक चलने के बाद अभी-अभी खत्म हुई और जैसा कि अक्सर होता है लंच का समय बीत चुका था। मीटिंग में अपने बास और कस्टमर के साथ उसने काफी पी ली थी इसलिए खाने की ऐसी कोई इच्छा नहीं हो रही थी। निशा ने सोचा कि चार बजे से फिर मीटिंग है इसलिए थोड़ा सा कुछ खा लेना चाहिए। उसने पास के रेस्टोरेंट से चिकन बर्गर आर्डर मँगाने का फैसला किया - मेज की दराज से उसने रेस्टोरेंट का मेन्यू कार्ड निकाला और फोन उठा कर वहाँ का नम्बर डायल कर दिया

मैं निशा बोल रही हूँ ग्लोबल ट्रैवेल्स से ...

एक चिकन बर्गर प्लीज...

 क्या बीस मिनट में आ जाएगा ... ठीक है... थोड़ा और जल्दी कीजिएगा तो अच्छा रहेगा।

फोन को वापस रिसीवर पर रखते हुए निशा ने फौरन दूसरे हाथ से अगली मीटिंग से सम्बन्धित फाइल उठा ली। एक मँहगे से दिखने वाले सुनहरे चश्मे के केस से उसने चश्मे को निकाल कर आँखों पर चढ़ाया और फाइल में खो गयी। लगभग पाँच मिनट बाद एकाएक उसके फोन की घंटी बज उठी, फाइल पर नज़र जमाए जमाए ही निशा ने फोन उठा कर कान पर लगाया

हलो .... दिस इज निशा फ्राम ग्लोबल ट्रैवेल्स ... हाउ कैन आई असिस्ट यू”, यह उसके आफिस का रिवाज था कि सारा स्टाफ फोन रिसीव करते समय ऐसे ही शुरूआत करता है। उधर से आवाज़ आई -

हलो निशा बेटी, ... मैं मनोरमा बोल रही हूँ....।

उधर से आई आवाज़ सुनकर ऐसा लगा जैसे तपस्या में बैठे किसी योगी का ध्यान भंग हो गया हो, निशा के मुँह से थोड़ी खुशी और थोड़े आश्चर्य से मिली जुली आवाज़ निकली क्या ??  मन्नो बुआ...!

हाँ ... तुम्हारी मन्नो बुआ....।

और बुआ जी बड़े दिनों बाद याद किया ...।

हाँ बेटी... इधर काफी व्यस्त रही और इस दौरान दिल्ली आने का मौका ही नहीं लगा ... नहीं तो तुम लोगों से ज़रूर मिलती”, मन्नो बुआ की निशा से यह लगभग पाँच वर्ष के अंतराल के बाद पहली बार बात हो रही थी।

तो आज आप दिल्ली में ही हैं ... फिर मौका निकाल कर घर आइए न..।

हाँ बेटी .. इसीलिए फोन किया... दरअसल कल सुबह-सुबह मेरी वापसी की ट्रेन है ... तुम लोगों से मिलना भी चाह रही थी ... अगर मैं रात को तुम लोगों के पास रुक कर वहीं से कल सुबह ट्रेन के लिए निकल जाऊँ तो तुम लोगों को कोई परेशानी तो नहीं होगी?”

क्या कह रही हैं बुआ जी ... आपके आने से और परेशानी? बिल्कुल नहीं... आप बस आ जाइए..।

ठीक है बेटी ... मेरा काम करीब एक घंटे में खत्म हो जाएगा फिर मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगी ...।

तनिक सोचते हुए, एक घंटे में ... कोई दिक्कत नहीं ... आप घर पहुँच जाइएगा मैं और मोहित भी जल्दी से जल्दी घर पहुँचते हैं..।

ठीक है ... और मोहित कैसा है...?

मोहित भी अच्छे हैं ... आप आइएगा तो खुद ही देख लीजिएगा ... हमारे घर का पता तो है न आपके पास..।

मन्नो बुआ बोलीं, रखा तो था ... लेकिन तुम फिर भी दोबारा लिखा ही दो...।

निशा ने मन्नो बुआ को अपने घर का पता और वहाँ पहुँचने के लिए दिशा निर्देश दिए। बात करके फोन नीचे रखा ही था कि आफिस ब्वाय ने आकर सूचना दी कि उनका खाने का आर्डर आ गया है। निशा ने पर्स से पैसे निकाल कर उसे देते हुए कहा कि बर्गर उसे वहीं केबिन में लाकर दे दे। कुछ ही देर में आफिस ब्वाय उसका चिकन बर्गर उसकी मेज पर रख गया। कुछ सोचते हुए निशा ने दोबारा फोन उठाया और एक नम्बर डायल किया -

हलो मोहित ...।

हाँ निशा ..।

मोहित .. यार अभी मन्नो बुआ का फोन आया था, वो आज यहीं दिल्ली में ही हैं और हमारे घर आ रही हैं..।

अच्छा .. यह वही मन्नो बुआ हैं जो हमारी शादी में भी काफी देखरेख में लगी हुईं थीं ... कुछ सोशल वर्क करती थीं न.।

हाँ हाँ वही ... लेकिन अब समस्या यह है कि मेरी अभी चार बजे से एक मीटिंग है जो कम से कम डेढ़ दो घंटे तक चलेगी... क्या तुम जल्दी घर जा सकते हो ... मन्नो बुआ तो अभी एक घंटे में घर पहुँच जाएँगी ...।

अरे नहीं रे .. तुम तो जानती हो न कि आजकल आडिट का काम चल रहा है .. बहुत जल्दी करुँगा तो भी आठ तो बज ही जाएगा ..।

अरे तो फिर क्या किया जाए ... मन्नो बुआ घर पर अकेली रहेंगी तो अच्छा नहीं लगेगा .।

अब यह बात तो अपनी बुआ को घर बुलाने से पहले सोचनी थी न... वैसे अकेली कहाँ ... मीरा भी तो होगी, और फिर छ: बजे तक लान के काम के लिए राजू भी पहुँच जाएगा ... आखिर इन लोगों को इतनी पगार किस दिन के लिए देते हैं इतना तो मैनेज कर ही लेंगे..।

तो तुम्हारा आफिस से निकलना नामुमकिन है?”

लगभग नामुमकिन ही है .. तुम जैसे भी हो मैनेज कर लो.. मैं जल्द से जल्द घर पहुँचने की कोशिश करता हूँ।

ठीक है मैं फिर मीरा को फोन कर देती हूँ कि वह मेरे पहुँचने तक मन्नो बुआ को बैठाए, चाय वाय पिलाए ...।

निशा ने फोन वापस रखकर बर्गर की तरफ हाथ बढ़ाया और मन ही मन बुदबुदाने लगी, हमेशा औरत को ही अपना काम छोड़ना पड़ता है ...ये नहीं कि कभी-कभी मर्द भी ...। उसने सामने पड़ी फाइल दोबारा उठा ली और वापस उसमें खो गयी, बीच बीच में अपने बर्गर को भी खा लेती थी। फिर उसकी नज़र गयी कलाई पर बँधी घड़ी पर मीटिंग का समय हो रहा था, फौरन उसने बचा हुआ बर्गर डस्टबिन के हवाले किया और फाइल उठा कर मीटिंग रूम की ओर बढ़ चली।

जैसा कि अंदेशा था मीटिंग करीब डेढ़ घण्टे चली मीटिंग से निकलते ही निशा ने झटपट अपना पर्स और बाकी सामान उठाया और सेक्रेटरी को बताया कि वह घर जा रही है। आफिस से बाहर निकलते ही उसने अपनी मर्सडीज कार स्टार्ट की और घर की तरफ चल पड़ी।

रास्ते में ट्रैफिक काफी था और निशा को घर पहुँचते-पहुँचते छ: बज गये। यह एक आलीशान बंगला था, दिल्ली जैसे शहर में इतना बड़ा बंगला बहुत कम लोगों के पास होता है। बाहर एक बड़ा सा लान था और दो मंजिल में बने यही कोई चार पाँच कमरों से पूरी तरह सुसज्जित घर। घर में घुसते ही मीरा सबसे पहले मिली और उसने खबर दी कि मन्नो बुआ को आए हुए करीब एक घण्टा हो चुका हैं और वे मीरा के ज़िद करने के बावजूद खुद ही चाय बना के पी चुकी हैं। निशा को देखते ही मन्नो बुआ ने हाथ मे पकड़ी हुई पत्रिका को नीचे मेज पर रख दिया और खुशी से चहक उठीं, अरे मेरी बच्ची ... निशा बेटी कैसी है...?

निशा ने आगे बढ़कर मन्नो बुआ को गले लगाया और बेहद गर्मजोशी के साथ मिली। निशा ने देखा कि मन्नो बुआ थोड़ी बूढ़ी ज़रूर हो गयी थीं लेकिन उनके व्यक्तित्व में पहले जैसी चमक अभी तक कायम थी। फूफा की मृत्यु के बाद मन्नो बुआ ने ही घर चलाया, बच्चों को पाला पोसा। जब बेटे बेटी अपने अपने घरों में लग गये तो मन्नो बुआ ने समाज सेवा का काम शुरू कर दिया। गरीब और अनाथ लड़कियों की देखभाल, उनके विवाह और विवाह के बाद आने वाली समस्याओं पर काम करने के लिए उन्होंने मुस्कान नामक एन जी ओ की स्थापना की। तबसे वे अपना सारा समय इसी काम के लिये लगाने लगीं और उसी सिलसिले में कभी कभार दिल्ली भी आती जातीं। इस बार काफी अर्से बाद उनका दिल्ली आना हुआ। निशा और मन्नो बुआ ने अगले दो घंटों तक तमाम पुरानी यादें ताजा की जिसमें निशा के बचपन की बातें, अपने पति और भाई की मृत्यु के बाद की मुश्किलों की चर्चा शामिल थी।

रात आठ बजे मोहित भी आफिस से आ गया और जल्द ही वह भी उन दोनों की महफ़िल में शामिल हो गया। मीरा ने खाना बना कर मेज पर लगा दिया तो सभी साथ बैठ कर खाना खाने लगे।

खाना और बातें ठीक चल रही थीं कि अचानक मन्नो बुआ ने एक अजीब सा विषय छेड़ दिया जिसे आधुनिक समाज में अभद्रता समझा जाता है

और भई तुम लोग ऐसे ही कब तक सिर्फ पैसे कमाने में लगे रहोगे ... कुछ बच्चों के बारे में सोचा या नहीं?

अचानक आए इस प्रश्न पर एक बार को मोहित और निशा चकित से रह गये पर फिर निशा ने ही कहा-

वो क्या है न बुआ जी हम दोनों ही अपने अपने काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि कभी मौका ही नहीं मिला बच्चों के बारे में सोचने और योजना बनाने का।

लेकिन बेटी तुम लोगों की शादी को गयारह साल हो चुके हैं और फिर इसमे कौन सी लम्बी चौड़ी योजना बनानी है, बस एक बार सोच लो .. अगर बहुत हो तो डाक्टर से सलाह ले लो ... वैसे सब कुछ ठीक तो है न।

इस बात ने मोहित को विचलित कर दिया, मर्दानगी से जुड़े सवालों पर ज्यादातर मर्द उत्तेजित हो जाते हैं। सामान्यत: शांत रहने वाले मोहित ने खीझ कर कहा – “मेडिकली हमें कोई प्राब्लम नहीं है। हमने बच्चे इसलिए नहीं किए क्योंकि हमें लगा कि हम उनकी देखभाल अभी नहीं कर सकते हैं। बच्चों से हमारे कैरियर की बढ़ोत्तरी रुक जाएगी।

निशा ने उसमें जोड़ा, अब देखिए न बुआ जी मोहित का इंवेस्टमेंट बैंकर के लिए प्रमोशन साल भर में तय है और मेरा तो अभी-अभी मैनेजर की पोस्ट पर प्रमोशन हुआ है।

कैरियर, कैरियर .. और बस कैरियर.. उसके अलावा ज़िन्दगी में कुछ और भी है कि नहीं?

निशा इस विषय पर हो रही बातचीत को लेकर अपने को असहज पा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मन्नो बुआ को एकदम से कैसे मना कर दे कि वे इस विषय में बातचीत न करें, मोहित भी शिष्टाचार के कारण लिहाज कर रहा था। सच्चाई तो यह थी कि शादी के तुरंत बाद ही निशा और मोहित ने यह मिलकर फैसला किया था कि उनका कैरियर उनके लिए बहुत अहम है इसलिए वे बच्चों के झंझट में नहीं पड़ेंगे। तब से लेकर अब तक दोनों ने आपस में भी कभी इस मुद्दे पर दोबारा बातचीत नहीं की थी, यहाँ तो उन्हें मन्नो बुआ को बाकायदा स्पष्टीकरण देना पड़ रहा था। फिर भी अपने को संयत करते हुए निशा ने ही कहा

नहीं बुआ जी सिर्फ कैरियर नहीं है .... हम दोनों आपस में बहुत खुश हैं और एक दूसरे का ख्याल भी रखते हैं साथ साथ समय बिताने के लिए हफ्ते में कम से कम दो तीन बार बाहर खाना खाने जाते हैं, साल में एक बार दोनों एक साथ एक दो हफ्ते की छुट्टी लेते हैं और खूब मजे करते हैं। अभी पिछले साल हम लोग इटली घूमने गये थे हम दोनों आपस में ऐसे ही खुश हैं, कभी बच्चों की कमी महसूस ही नहीं हुई।

मोहित ने भी निशा की बात में बात जोड़ी और विषय को टालने का प्रयास किया अभी हम लोग जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं ... अगर लगेगा तो बाद में एक बच्चे को गोद ले लेंगे।

लेकिन मन्नो बुआ तो जैसे इस विषय पर अटक ही गयीं थीं, कई बार बड़े बुजुर्गों को शायद यह दिखता ही नहीं है कि युवा पीढ़ी को उनकी बातें पसन्द नहीं आ रही हैं। उन्होंने कहना जारी रखा -

अगर तुम्हारे जैसे सक्षम लोग, जो बच्चों की अच्छी परवरिश का खर्च उठा सकते हैं ऐसा सोचने लगेंगे तो क्या होगा। दूसरी तरफ देश के गरीब और अनपढ़ लोग बिना सोचे समझे बच्चे पे बच्चे पैदा किए जा रहे हैं।

तो ठीक है न... वे लोग हमारे जैसों की भरपाई कर रहे हैं न...।

लेकिन वे लोग गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख सकते ... तुम लोग पढ़े लिखे हो, अच्छा कमाते हो, बच्चों की आदर्श परवरिश कर सकते हो। समाज में संख्या और गुणवत्ता दोनों की ज़रूरत होती है ... तुम लोग अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते हो। 

मन्नो बुआ की बातों से अब तो बाकायदा बहस चालू हो गयी और मोहित जो अब तक झिझक रहा था मुखर हो उठा और उसकी देखा देखी निशा भी आरोप प्रत्यारोप में शामिल हो गयी

आपको ऐसा क्यों लगता है कि हम बच्चों की अच्छी परवरिश कर सकते हैं .. आप तो देख ही रही हैं हमारे पास उनके लिए समय ही नहीं होगा...।

एक बार बच्चे हो जाएँगे तो समय भी निकल आएगा ... ज़िन्दगी में सब कुछ गणना के आधार पर नहीं चलता है। तुम लोगों को एक बात और सोचनी चाहिए ... अभी तो तुम लोग स्वस्थ हो चाहो तो बच्चे पैदा कर सकते हो लेकिन पाँच दस साल बाद तो खतरे वाली बात हो जाएगी ... शायद डाक्टर ही इजाज़त नहीं देगा। याद रखो कुछ और समय बीतने के बाद तुम लोगों को भी सहारे की ज़रूरत होगी हमेशा तो जवान नहीं रहोगे...। 

बुआ जी आपने भी तो यही किया था लेकिन आज आप के साथ न बेटा सुमित रहता है और न बेटी मुक्ता... क्या फायदा हुआ बच्चों की आदर्श परवरिश करने का.।

हम लोगों ने सोचा है कि अगले दस सालों में इतना पैसा इकट्ठा कर लेंगे कि आराम से रिटायर हो सकें। 

तुम लोग और रिटायर ... जिस तरीके से तुम लोग रोज़ बारह चौदह घण्टे रोज़ काम करते हो तुम लोगों को लगता है कि ऐसे ही अभी दस साल और काम कर सकोगे। जो तुम कह रहे हो वह सिर्फ पश्चिमी समाज में हो सकता है।

अगर ऐसा वहाँ हो सकता है तो यहाँ भी संभव है.. हमारा देश अब किसी मामले में पीछे नहीं रहा।

यह सुन मन्नो बुआ ने एक नया तर्क पेश किया, देखो बेटी ... तुम मेरे स्वर्गीय भाई की एकलौती संतान हो .. ऐसे तो वंश वृक्ष यहीं रुक जाएगा?”

अब तक निशा भी खीझ उठी थी, तो फिर आपको अपने भाई को समझाना था ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए ... हमें क्यों मजबूर कर रही हैं?”

तुम्हें पता नहीं है ... अगर मजबूरी नहीं होती तो निश्चित रुप से भाई साहब और बच्चे चाहते थे। फिर कुछ रुक कर, “ ...बेटी अगर मेरे भाई भाभी ने भी तुम लोगों की तरह सोचा होता तो आज तुम यह सब कहने के लिए यहाँ नहीं होती। हमारे शास्त्रों में हर गृहस्थ के लिए एक कर्तव्य यह भी बताया गया है...।

अब तक  मोहित के सब्र का बाँध टूट चुका था और उसकी नज़रों में यह सारा वार्तालाप उनकी निजी ज़िन्दगी में हद से ज्यादा हस्तक्षेप था।

बुआ जी... बहुत हो गया .. अब इस विषय पर और कोई बातचीत नहीं होगी। मेरा ख्याल है हम दोनों इतने परिपक्व हैं कि अपने लिए सही फैसला कर सकें।

मन्नो बुआ कहना तो शायद और भी कुछ चाह रही थीं लेकिन मोहित की यह बात सुन ख़ामोश हो गयीं और साथ ही कुछ उदास भी एक बुआ और एक समाजसेविका की हैसियत से वे अपने ही घर में अपनी बात मनवा पाने में असफल रही थीं। उसके बाद वास्तव में और कोई बातचीत नहीं हुई न इस विषय पर और न ही किसी और विषय पर। न चाहते हुए भी तीनों ने सम्बन्धों में कुछ खटास महसूस की। मन्नो बुआ को उनका सोने का कमरा बता दिया गया और निशा और मोहित अपने कमरे में चले गये।

कमरे में मोहित ने अपनी बची हुई भंड़ास निकाल ली निशा को सुना कर, ये तुम्हारी बुआ भी न .. कुछ भी बकवास करती हैं...। इसी ज़रूरी बातचीत के लिए तुम और मैं अपने आफिस छोड़ कर जल्दी घर आए थे?” निशा भी मन्नो बुआ के व्यवहार से क्षुब्ध थी उसे भी समझ में नहीं आ रहा था कि मन्नो बुआ को क्या ज़रूरत थी उनकी निजी ज़िन्दगी में टाँग अड़ाने की, बोली, तुम टेंशन मत लो ... पहले तो कभी उन्होंने ऐसी बात नहीं की, पता नहीं आज क्या हो गया है। आगे से घर बुलाऊँगी ही नहीं ....।

मन्नो बुआ भी अपने कमरे में देर रात तक करवट बदलती रहीं, उन्हें वास्तव में इस बात की तकलीफ़ थी कि उनके भाई का वंश इसके बाद समाप्त हो जाएगा।

सुबह सात बजे मन्नो बुआ की वापसी की ट्रेन थी सो वे जल्दी से तैयार हो कर कमरे से बाहर आ गयीं। अब तक निशा और मोहित के मन में भी रात की तल्खी कुछ कम पड़ गयी थी। दोनों ने सोचा दस पाँच मिनट की बात है बस मन्नो बुआ को विदा ही तो करना है इसलिए औपचारिकता निभाने के लिए वे भी तैयार होकर बाहर आ गये। मन्नो बुआ ने बताया कि वे नाश्ता नहीं करेंगी क्योंकि शताब्दी ट्रेन में बहुत कुछ खाने को ऐसे ही मिलता है। तभी मीरा ने आकर बताया कि मन्नो बुआ की टैक्सी आ गयी है। यह सुनते ही मन्नो बुआ जाने के लिए उठ खड़ी हुईं, लिहाज करते हुए पहले मोहित ने उनके पैर छुए और फिर निशा ने भी। निशा जब पैर छू रही थी तो अनायास ही मन्नो बुआ के मुँह से वही आशीर्वाद एक बार फिर निकल पड़ा जो उन्होने गयारह वर्ष पहले निशा को उसकी शादी के समय दिया था पुत्रवती भव..! 


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