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ISSN 2292-9754

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11.06.2016


ज़िंदा भी हूँ मुर्दा भी

तुम्हारे हाथों की लकीरें क्यों मिट गई है
क्या तुम क़िस्मत को धोखा दे बैठे हो
या क़िस्मत से धोखा खा चुके हो...
कुछ तो बोलो
मिटी हुई लकीरों का राज़ तो खोलो
मैं भी तुम में से एक हूँ
जिसके हाथों की लकीरें
बिलकुल आबादी की तरह,
भारत की आज़ादी की तरह
अभी समझा, शायद तुम्हारी ख़ामोशी ही
मिटी हुई लकीरों का राज़ है
इसीलिए तो गधों के सर पर ताज है।


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