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ISSN 2292-9754

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11.06.2016


साक्षात्कार

जश्न के दिन जनाज़े की बात न करिये
मेरे अन्दर दफ़न इंसान आज ही तो जगा है
थोड़ा इसे हवाओं में घुलने दो
चलने दो क्षितिज तक
जहाँ उगते हैं कोमल विचार
क्यों स्वार्थ का ताबूत लिए पीछे पड़े हो
अब तक पानी में फेंकते थे जाल
अब हवाओं में लेकर खड़े हो
कभी तो अपने अन्दर छुपे हुए इंसान से डरिये
जश्न के दिन जनाज़े की बात न करिये।


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