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ISSN 2292-9754

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11.06.2016


नारों के नारायण

मुर्दों को ज़िंदाबाद
ज़िन्दों को मुर्दाबाद
के नारे में ख़ुद को भरवाते हैं
भीड़ में मशालें
अकेले में बस चूल्हा जलाते हैं

मुर्दों को ज़िंदाबाद
ज़िन्दों को मुर्दाबाद
कह-कहकर कभी आम-आदमी
तो कभी नेता बन जाते हैं
मौक़ा मिला तो पत्थर मारते हैं
वर्ना ज़िंदगी भर पत्थरों पर
सर झुकाते हैं।

या सिर्फ़ नारों के नारायण
बनकर रह जाते हैं।


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