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ISSN 2292-9754

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03.03.2017


अकेले मन की दुविधा

जीवन के इस द्वंद्व युद्ध में
एक अकेला मेरा मन
सत्य असत्य उचित अनुचित में
विचरण करता मेरा मन

कभी योग के शिखर पे चढ़ता
कभी वासना की खाई में गिरता
जीवन रूपी भवसागर में
उद्वेलित सा मेरा मन।

कभी पुण्य की हवा में डूबा
कभी पाप की नदी में बहता
कभी झूठ की बस्ती में
खोज सत्य की करता मन

कभी दुहाई ईमान की देता
कभी बेईमानी के घोडों पर चढता
हत्या लूट डकैती के शोरों में
खोज शान्ति की करता मन।

एक अकेले मन की दुविधा
सचमुच कितनी व्यापक है
मन तो मात्र स्वक्रीड़ा करता
सुन्दर सा एक शावक है

सत्य असत्य अनुराग द्वेष के
चहुँ ओर मैदान पड़े हैं
जिधर भी चाहो उधर को दौड़े
सुन्दर सुघड़ सलोना मन
जीवन के इस द्वंद्व युद्ध में
एक अकेला मेरा मन।


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