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04.26.2014


रोपवे

अगस्त माह। कभी तेज़ बारिश होती तो कभी थम जाती। हम वर्षा की इस आँख मिचौली से काफी परेशान थे। जबलपुर से मेरा छोटा भाई अखिलेश सपत्नीक अपनी तीन साल की नन्हीं बच्ची सोनल के साथ आया हुआ था। मेरे तीन बच्चों में एक बड़ा मनीष, सपना और गौरव को तो मानो सोनल एक गुड़िया के रूप में खेलने को मिल गई थी। सभी उसकी प्यारी मीठी तोतली बाते सुनकर खुशियाँ लूटने में मगन थे। छोटे भाई अखिलेश का अपना व्यवसाय था। पत्नी के साथ निकलने का कम ही मौका मिलता था इसलिये उसे अपने धंधा से अवकाश बहुत कम मिलता था। बड़ी मुश्किल से तीन दिन के लिये आ पाया था। उसका एक दिन रायपुर में रिश्तेदारों से मिलने-जुलने में गुज़र गया। दूसरे ही दिन मेरी पत्नी पल्लवी और अखिलेश की पत्नी सुनंदा ने डोंगरगढ़ चलने का प्रस्ताव रखा। देवी दर्शन के साथ-साथ मनोहारी प्राकृतिक छटा का दृश्यावलोकन। अधिकांश ने अपनी सहमति प्रगट कर दी।

इस प्रस्ताव पर मुझे छोड़ कर सभी एक मतेन थे। मेरी देवी देवताओं पर पूर्ण आस्था तो थी। पर बाप रे ...डोंगरगढ़ की चढ़ाई ...सपाट सीधी -ऊॅंची ... नहीं भाई ... भगवान ही बचाए। सुनते ही मेरे हाथ पाँव काँपने लगे। पैरों की पिंडलियों में असहनीय दर्द उठने लगता - हाथ पाँव फूलने लगते, चूँकि मैं अपनी पल्लवी के साथ मैहर एवं डोंगरगढ़ की सीढ़ियाँ चढ़ चुका था। मुझ जैसे नाजुक बैंक में काम करने वाले सुख भोगी इंसान के लिये तो मिरजापुर की माँ विंध्यवासिनी के दर्शन ही बड़े भले लगते हैं। मैं छुट्टी न मिलने के बहाने बनाकर अपनी जान बचाते फिर रहा था। तभी भोली-भाली नन्ही मासूम सोनल जो मुझे काफी देर से घूर-घूर कर देखे जा रही थी, तुतलाहट भरे मासूम अंदाज़ में अपने नन्हे हाथों को मटका कर बोली -

"अले... क्या ताऊ जी ... सीली तढ़ने से डलते हैं। मेले साथ मेली ऊॅंगली पकल तड़ना ताऊ जी!... मैं साली की साली ... सीली तड़ा दूँगी ..." यह सुनकर सभी खिलखिलाकर हॅंस पड़े। सबकी नज़रें मेरी ओर लगी थीं। मैं निःसहाय सा असमंजस में पड़ गया था। तभी मेरी बेटी सपना ने कान में कहा -

"पापाजी! आप चिंता क्यों करते हैं? आजकल वहाँ रोपवे चलते हैं। सर्र से ऊपर, सर्र से नीचे। पिछले बार में मामा जी के साथ गयी थी। कोई तकलीफ नहीं हुई।" यह सुनते ही मुझमें एक साहस का संचार हुआ और एक शक्ति सी आ गई। अपने सभी बहाने के हथियार डाल कर, सहर्श चलने की सहमति दे दी।

अब हम सभी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में जुट गए। सुबह पाँच बजे की ट्रेन पकड़ने के लिये चार बजे उठना। नहा धोकर घर से निकलना। स्टेशन तक रिक्शे का जुगाड़ करना। रास्ते के लिये नाश्ता व खाने की व्यवस्था आदि अनेकों प्रश्न एक साथ उठ खड़े हुये। सभी की अलग-अलग ड्यूटी लगा दी गई। कब रात्रि के दस बज गये, पता ही नहीं चला। किचिन से आ रही बर्तनों व हॅंसी ठहाकों के बीच दीवार घड़ी ने संगीतमय टन...टन... की ध्वनि से सबको आकर्षित कर चौंका दिया। रात्रि के बारह बज गये थे। समय बड़ी तेजी से भाग रहा था। मैं सभी को सुबह चार बजे उठने की सलाह देकर स्वयं शयन कक्ष में सोने को चला गया।

टेबल घड़ी ने अपने वायदे के मुताबिक सुबह के चार बजे ही अपनी कर्कश अलार्म बजा दिया। नींद में डूबे हुए लोग बिस्तर से उठने को मजबूर हो गये। सभी अपनी अधखुली आँखों से यंत्रवत नित्य क्रिया-कलापों में जुट गए थे। घर के बच्चों को बिस्तर से उठा-उठाकर बैठाने की बार-बार प्रक्रिया ने झुँझलाहट शोर शराबे और तनावों की ध्वनि तरंगों को और तेज़ कर दिया था। रिक्शे की तलाश से लेकर स्टेशन के प्लेटफार्म तक पहुँचते -पहुँचते जैसे सब कुछ शांत हो गया था। चूँकि सुबह डोंगरगढ़ जाने वाली वह गाड़ी तीन घंटे लेट चल रही थी, इतनी मेहनत मशक्कत की पर सब बेकार लगने लगा था, पर कर भी क्या सकते थे। अगर हम लोग लेट हो जाते तो गाड़ी थोड़े ही हमारे लिये रुक सकती थी। यह एक सत्य था।

प्लेटफार्म में इतना लम्बा समय काटना अक्सर लोगों के लिए बड़ा मुश्किल कार्य होता है। हम सभी अपने अतीत को वर्तमान में खड़ा करके कभी उसका पुनरावलोकन करके, तो कभी किसी का छिद्रान्वेशण करके समय काटने में लग गये। रात्रि की तैयारी से लेकर सुबह की भागम-भाग तक एक दूसरे के क्रिया-कलापों का लेखा-जोखा बनाने में किसी लेखाप्रवर समिति की भाँति जुट गए थे। बीच-बीच में सोनल अपनी उपेक्षा पर अपनी तोतली बातों से सबका ध्यान आकर्षित कर हँसाने व गुदगुदाने का कार्य करती रही। प्लेटफार्म पर आती ट्रेन की सीटी ने जैसे सभी की बातों में ब्रेक लगा दी हो। सभी पूर्वर्निधारित अपने-अपने हाथों में सामानों को थामे ट्रेन के अंदर घुसने में व्यस्त हो गये।

ट्रेन अंततः एक लम्बी सीटी बजाकर रवाना हुयी। उसके संग वह प्लेटफार्म पीछे छूटने लगा। खड़े रिश्तेदार अपने चिरपरिचितों को हाथ हिला-हिला कर विदा कर रहे थे। दौड़ते-भागते, गाँव-शहर। खेत खलिहान। सड़के-पगडंडियाँ। खम्बे-पहाड़। झाड़-झाड़ियाँ। नदी-नाले। हम सभी खिड़की से देखते जा रहे थे। महिलाओं का तो अपना एक संसार अलग होता है। सुनंदा और पल्लवी दोनों अपनी घरेलू बातों में मग्न थीं। चलती रेल की खिड़की से झाँकती सोनल की बाल सुलभ जिज्ञासा जागती और -

"ताऊ जी.... ताऊ जी ...."

"ये थब क्यों भाग लहे हैं ?"

मैंने कहा -ये सब हमारी सोनल के साथ-साथ जाने को दौड़ रहे हैं।

"ताऊ जी.... ताऊ जी ....वो क्या कल लहे हैं ?"

मैंने कहा -वो खेतों में काम कर रहे हैं।

"ताम क्यों कलते हैं,ताऊ जी...?"

मैंने कहा -उससे फसल पैदा होती है। जिसे हम सभी खाते हैं और अपने पेट की भूख मिटाते हैं।

जैसे अनेक प्रश्न किए जा रही थी। हमारे उत्तरों से उसके प्रश्नों का समाधान होता था या नहीं। मैं नहीं जानता किन्तु वह उत्तर के बाद "अच्छा" कहकर मुझे संतुष्टि का बोध अवश्य कराती जाती थी।

तभी ट्रेन में एक खिलौने वाला अपने मुँह को फुलाकर पुंगी से शोर मचाता प्रकट हुआ और सोनल के सामने ही खड़ा होकर ज़ोर-ज़ोर से बजाने लगा। जिसमें उसको सफलता मिली। सोनल अपने पापा के पीछे पड़ गयी।

"पापा... पापा...हमको भी पुंगी ले दो ना ...।"

अखिलेश ने कहा - नहीं.. तू मेरे सामने हरदम शोर मचाएगी और सबको परेशान करेगी।

"थत् पापा..., हम सोल नहीं मताएँगे ..., तब आप थो दाएँगे ...तब बदाएँगे ...। ले दो न पापा ... ले दो न पापा ... ले दो न ताई जी ...।"

उसकी इस बात पर हम सभी हॅंस पड़े। आखिर पुंगी उसको लेके देनी ही पड़ी । सोनल के साथ बात करते-करते कब समय गुज़र गया, मालूम ही नहीं पड़ा। गाड़ी डोंगरगढ़ प्लेटफार्म पर खड़ी थी। सामने ऊॅंचे पहाड़ पर मंदिर दिख रहा था। देवी माता के आस्था और विश्वास का केन्द्र बिन्दु, यह बम्बलेश्वरी देवी का मंदिर है- लोगों ने बताया। यहाँ दर्शनों को लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं, पहाड़ की चोटी पर चढ़कर अनुपम प्राकृतिक छटा को निहारते और मन ही मन आह्लादित होते हैं।

ऐसे स्थानों पर निरंतर बढ़ती भीड़ स्थानीय लोगों के जीविका का साधन भी बन जाती है। निराश्रित अपंग बूढ़े-बड़े भिक्षा माँग कर कुछ जुटाने में लग जाते हैं। होटल, दुकानों के साथ-साथ व्यवसाय के नए-नए रूप उभर कर सामने आने लगते हैं। यही सोचते हुए हम सभी दुकानों और होटलों की लम्बी कतारों को पार करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि बड़ी-बड़ी बूँदों के साथ वर्षा ने मार्ग रोकना चाहा। भीजने से घबराकर पास की एक दुकान में घुस गये।

दुकानदार इतने सारे ग्राहकों को देखकर बड़ा खुश हो गया। मानों "बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो।" वर्षा को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था। वह तुरंत लम्बी बैंच की ओर इशारा करके सभी को बैठने का आग्रह करने लगा। और "क्या लाऊॅं भाई साहिब ...?" कह कर सामने खड़ा हो गया।

चाय का आर्डर मिलते ही वह फिर तुरंत ही लाल तूस के कपड़ों में बँधे प्रसाद, फूल-माला को खरीदने का आग्रह करने लगा। उसकी व्यवसायिक चतुराई और हम लोगों की परेशानी दोनों ने मिलकर आपसी सामंजस्य स्थापित कर लिया था। बीस मिनिट गुज़र गए थे। बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

सामने रोपवे के प्रवेश द्वार टँगा एक बोर्ड मुझको मुँह चिढ़ाता नज़र आ रहा था। सभी दर्शनार्थियों से तकनीकी खराबी के कारण खेद सहित क्षमा याचना की माँग रहा था। घर के सभी लोगों की निगाहें मेरे चेहरे पर लगी हुईं थी मानो वह बोर्ड मेरे लिये ही बना था। उस समय सबकी नज़रों में मैं एक बेचारा सहानुभूति का पात्र बन गया था। किन्तु मैं भी चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाए बड़े निर्विकार भाव से वर्षा को देखे जाने का नाटक कर रहा था। क्योंकि जब सिर ऊखल में दिया हो तो मुसर से क्या डरना।

"ऐसी विपरीत विपत्ति को झेलने काश... घर से छाता लाए होते, तो हम लोग भी वर्षा के आनंद के साथ-साथ देवी दर्शनों का लाभ उठाते।" - मेरी पत्नी पल्लवी ने कहा।

दुकानदार तो जैसे यही वाक्य सुनने को आतुर था, बोला - "बाबू जी, यहाँ छाता मिल सकता है। किराया मात्र दस रुपया। जमानत के पचास रुपया। लाऊॅं....?"

अखिलेश ने परेशानी का सहज हल मिल जाने पर खुशी प्रकट की। बोला - "लाईए। पर दो से क्या बनेगा, तीन मिलते तो ..."

दुकानदार ने उसके कथन की वास्तविकता समझी। छाता लगाए सामने बैठी भिखारिन के पास गया। कुछ धीरे से बात कर उसका छाता ले आया।

"अब तीन छातों में सब भीजनें से बच जायेंगे।" - सुनंदा बोल उठी।

मैंने देखा उस वृद्धा का चेहरा खिल उठा था। हाथ का कटोरा अपने थैले में रखकर दुकानदार की बनायी छाया में आकर बैठ गयी थी। उसकी आँखों में एक नया आत्मविश्वास झलक रहा था। उसे बड़ी खुशी हुई।

छाते को तान कर हम सभी एक फर्लांग बढ़े ही थे कि एकाएक खुला आकाश हम पर ठहाका मार कर हॅंसता नज़र आया। छातों को बंद कर इस बोझ से मुक्ति की छटपटाहट का भाव मेरे छोटे बेटे गौरव ने भाँप लिया था। वह किसी मैराथन धावकों की भाँति विस्हल बजने के इंतज़ार में तैयार था। इसके लिए मेरी पत्नी पल्लवी ने भूमिका बाँधते हुए कहा -

"अब इन छातों को भी ढोना पड़ेगा और ऊपर से किराया भी लगेगा। गौरव प्लीज ...।"

आदेश पाते ही गौरव दौड़ पड़ा। मेरी कल्पना में उसी क्षण उस वृद्धा भिखारिन का खिला चेहरा उदास सा दिखाई देने लगा। तभी गौरव ने आकर चतुर व्यवसायिक दुकानदार का संदेश एक साँस में सुना दिया कि "मम्मी किराया तो लगेगा, जब लौटोगे तो किराया काट कर पैसे वापस मिल जाएँगे।"

सुन कर मुझे मन ही मन अच्छा लगा। आकाश की इस मसखरी पर हम सभी हॅंसते खिलखिलाते चढ़ाई चढ़ने, सीढ़ियों के पास पहुँच गए।

तुरंत सोनल ने आकर अपने नन्हे हाथ मेरे सामने कर उॅंगली बढ़ा दी और बोली "ताऊ जी डलना नईं मेली उॅंगली अत्थे से पकल के चलना... " मानों उसे अपना दिया वचन स्मरण था। उसकी बातों पर हम सभी हॅंस पड़े।

अभी हमारे कदम मंदिर की पहली सीढ़ी पर पड़े ही थे कि - बाबू जी ...के सम्बोधन ने वहीं रोक दिया। पीछे पलट कर देखा तो एक वृद्ध था। छोटे-बच्चों को गोद में लेकर आने-जाने की यात्रा का सहायक श्रमजीवी। इनकी भी एक जमात है -उसी का यह भी एक सदस्य था। वृद्ध ने हाथ जोड़कर दीनता भरी आवाज़ में याचना की -

"बाबू जी ... हम सिर्फ बीस रुपए लेंगे ... इस बच्ची के ...ना, नहीं करना बाबू जी ... दो दिनों से कोई मजदूरी नहीं बनी ... इसे लेकर चढ़ेंगे तो आप थक जाएँगे ... देवी माँ आप सबका भला करे। आज रोपवे बंद है, सो आशा बँधी है बाबू जी ..."

मैंने सुनंदा - सोनल के भाव जाने। सुनंदा प्रभावित थी सो सहमत दिखी - किन्तु सोनल ने अपनी माँ का आँचल छोड़ पीछे छिपकर विरोध का स्पष्ट संकेत दे दिया -

"नईं ...सीली मैं (चढ़ूँगी ) तढ़ूँगी ...तढ़ूँगी ...तढ़ूँगी...।"

मेरे सामने दुविधा थी। एक तरफ सोनल का बालहठ तो दूसरी ओर यह श्रमजीवी बेबस वृद्ध।
"आ जा रानी बिटिया... बाबाजी की बात मान ले ... तू जानती नहीं ... थक जाएगी। जा... बाबा जी की गोद में जा..." सुनंदा ने पुचकारते हुए कहा -।

पर सोनल ने बाबा की गोदी में जाने की बजाय पलभर में पाँच-छः सीढ़ियाँ चढ़कर अपनी शक्ति की विश्वसनीयता प्रकट कर दी। सुनंदा को भी अपना रुख बदलना पड़ा। "बाबा जी छोड़िए .. यह बहुत हठी है, बात नहीं मानेगी।"

मैंने वृद्ध की ओर देखा। याचना की निष्फलता देख उसे दुख हुआ। पाँच का नोट उसकी ओर बढ़ा दिए पर उसकी सजल आँखों एवं काँपते हाथों ने उसे ग्रहण करने में असहमति दे दी।

"नहीं बाबू जी ... बिना मेहनत नहीं ... उस देवी माँ की शायद यही मर्जी है...आप लोग जाइए ...आप सभी का कल्याण हो ...।"

कुछ सीढ़ी चढ़ी सोनल ने वृद्ध के निकलते आँसू देखे तो तुरंत नीचे उतर आई। उनके करीब आकर बोली -

"मत लो बाबा जी ... तुम तो मेरे दादा जी से हो ना ... वे भी ज्यादा नईं तलते ...थक जाते हैं। तुम भी थक जाओगे बाबा जी ... हैना, ताऊ जी ...हैना मम्मी... हैना पापा....।"

बाबा जी के रूप में हमारे वृद्ध पिता की तस्वीर आँखों के सामने झूल गयी। मेरे लिये यह भावुकता की चरम सीमा थी। जेब से बीस रुपए निकाले। जबरन उसे थमा दिए, बोला -

"ना नहीं करना बाबा जी ... दिल टूट जायेगा ... हमको अपना बेटा समझ कर ही इसे रख लीजिए ....इसके आगे अवरुद्ध कंठ ने दोनों को कुछ कहने न दिया।

बाबा ने सोनल को अपनी गोद में उठा सीने से लगा लिया। ऐसी आत्मीयता पाकर वह भावह्विल हो सोनल के सिर पर लगातार हाथ फेरे जा रहा था। उसे साक्षात् देवी समझ अपने दोनों हाथ जोड़ दिये थे।

इन आत्मीय मधुर स्मृतियों के संग हम सभी के कदम माँ के मंदिर के दर्शन के लिये आगे बढ़े जा रहे थे। पीछे पलट कर देखा वह "बाबा" हमारी मंगलमय यात्रा के लिये नीचे खड़े हाथ हिलाये जा रहे थे और हम मंदिर के लिये आगे बढ़े जा रहे थे।


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