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04.28.2014


फागुन के दिन आ गये

कविता के रस रंग में, फागुन की सुरताल।
सजी हुई इस वर्ष भी, होली की चौपाल ।।

यह फागुन छाया है, बहारें लाया है ।
यह होली आई है, रंगों को लायी है ।।....

फागुन के दिन आ गये, मन में उठे तरंग ।
हॅंसी ठहाके गूँजते, चौपालों में संग ।।

कि बालें पक आईं, खेतों में लहरायी......

महफिल फागों की सजें, टिमकी और मृदंग ।
दाऊ नाचे लट्ठ ले, हुरियारों के संग ।।

कि बसंती ऋतु छाई, सभी के मन भायी...

घर घर गावें टोलियाँ, नर नारी के संग ।
आओ अब निकलो सभी, हाथों में ले रंग ।।

वो कोयल कूक रही, मधुरिमा घोल रही...

प्रेम रंग में डूब कर, सभी बजावें चंग ।
पिचकारी में रंग भर, गोरी खेलें संग ।।

राधा किशन की जोड़ी, खेलती ब्रज में होरी...

जीवन में हर रंग का, है अपना सुरताल ।
पर होली में रंग सब, गलें मिले हर साल ।।

कि छोड़ो बैर बुराई, इसी में सबकी भलायी...

अरहर झूमे खेत में, आम बना सिरमौर ।
खुशहाली पुरवा बहे, तन मन नाचे मोर ।।

गाँव की किस्मत जागी,घरों में खुशियाँ छायी....

जंगल में टेसू हॅंसे, गाँव खिली गुलनार ।
चम्पा महके शहर में, बाग हुए गुलजार ।।

प्रकृति की छटा निराली, ख़ुशी से झूमे धरती .....

ईशुर फाँगें गा रहे, गाँव शहर के लोग ।
बासंती पुरवाई संग, झूम रहे सब लोग ।।

ये होली ऋतु आयी, सभी के मन भायी
यह होली आई है, रंगों को लायी है ।।....

दहन करें मिल होलिका, घर- घर उड़े गुलाल ।
गले मिलें मिल जुल सभी, मन के हरें मलाल ।।

कि एकता मुसकायी, विकास की डगर दिखायी.....


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