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ISSN 2292-9754

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02.12.2016


सूरज चाचू

सूरज चाचू क्यों रूठे हो
हमको ज़रा बताओ तो।

कई दिनों से छुपे हुए हो
घर से बाहर आओ तो।

ठंढ के मारे थर-थर काँपूँ
गर्मी तनिक बढ़ाओ तो।

सूरज चाचू क्यों रूठे हो
हमको ज़रा बताओ तो।


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