अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.27.2007
 
तुम्हारा संस्मरण
मनोज कुमार धीमान

हाँ, मुझे याद है
तुम्हारे
नरम हाथों का
वो गरम स्पर्श
जब
तुम पीछे से
आकर
ढक देती थीं
सजल नेत्रों को
और
मैं सब कुछ जानकर
अनजान
बन जाता था।

जब
तुम धड़कते हुए
हृदय में
समाहित कर लेती थीं
शान्त हृदय को
और
मैं
अशान्त हृदय से
हर धड़कन को
गिनता था।

जब
तुम कँपकपाते
हुये होंठो से
कुछ
शिकायत
करना चाहती थी
और चुप रह
जाती थी
तब मैं
शायद कुछ सुनना
ही नहीं
चाहता था।

जब तुम
अपनी बाहों
में
कसकर
हर लम्हें
को
जी लेना चाहती थी
और
मैं
जीना ही
नहीं चाहता था।

जब
तुमने
जाते हुए
अपनी अश्रु भरी
आखों से
ना जाने के
लिए कहा था
और मैं
कुछ समझना ही
नहीं चाहता था।

आज
तुम नहीं
हो............
हैं तो बस
तुम्हारी यादें
कई बार
मैंने खुली आँखों से;
कसे हुए शरीर से;
तुम्हारे लब पढ़ते हुए
खुद को
अन्धकार में पाया है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें