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09.27.2007
 
क्या हूँ मैं?
मनोज कुमार धीमान

कभी-कभी
सोचता
हूँ

क्या हूँ मैं?
गुरुद्वारे के बाहर
टंगा
हुआ
कपड़ा
कि
जब चाहा
ओढ़ कर सजदा किया
और टाँग दिया खूँटी पर।

मस्जिद के बाहर
रखा
हुआ
लोटा
कि
जब चाहा
वज्जु किया
और रख दिया नल के पास।

या
वेश्यालय की वेश्याओं
का
बिस्तर
कि
जब ग्राहक आया
गरम हुआ
नही तो नरम पड़ा रहा।

एक किराये
का
कमरा
कि कोई भी आया, रहा
और छोड़ कर चल दिया।
इन सबसे हटकर मैं हूँ
अस्तित्व हीन
जिसका
न कोई अस्तित्व था
न है
न होगा।
कभी-कभी
सोचता
हूँ
क्या हूँ मैं?


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