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ISSN 2292-9754

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03.20.2016



राजवीर की प्रमोशन हुई तो उसे मैनेजमेंट ट्रेनिंग के लिए कंपनी की ओर से शहर भेज दिया गया। वो पेशे से एक इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर था। पहाड़ी प्रदेश में ही पले–बढ़े राजवीर को शहर का गर्म और प्रदूषित वातावरण रास नहीं आया और उसे साँस से सम्बंधित कुछ समस्या हो गयी। ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से एक दिन की छुट्टी लेकर वो एक डॉक्टर की क्लिनिक पर चेक-अप करवाने गया। उसके दो सहकर्मी साथी भी उसके साथ थे।

अभी वो क्लिनिक में प्रविष्ट हुए ही थे की इतने में एक देहाती सी दिखने वाली घरेलू महिला अपने ख़ून से लथपथ बच्चे को उठाकर अन्दर आई। वो एकदम डरी और सहमी हुई सी थी। उसका क़रीब दो साल का बच्चा अचेत अवस्था में था। राजवीर, उसके दोस्त और क्लिनिक का स्टाफ़ सभी उस औरत और बच्चे की तरफ़ देखने लगे। उस महिला के साथ एक व्यक्ति भी आया था जिसने बताया की ये महिला सड़क के किनारे अपने बच्चे को उठाये रो रही थी। सड़क क्रॉस करने की कोशिश में किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी और वो भाग खड़ा हुआ। महिला बच्चे समेत नीचे गिर गई थी और बच्चे के सिर पर गंभीर चोट आ गई थी।

डॉक्टर ने बच्चे को हिलाया–डुलाया और उसके दिल की धड़कन चैक की। एक क्षण के लिए तो लग रहा था की जैसे उसमें जान ही नहीं है। महिला का रुदन जैसे राजवीर के हृदय को चीरता सा जा रहा था। डॉक्टर ने बच्चे का घाव देखा और उसे साफ़ किया। इतने में बच्चा होश में आकर रोने लगा तो महिला की जान में जान आई। डॉक्टर ने उसके सिर पर तीन टाँके लगाये।

बच्चे की मरहम पट्टी कर डॉक्टर ने बिल उस महिला के हाथ में थमा दिया। जिसे देखकर वो देहाती महिला अवाक् रह गई। महिला के साथ आया हुआ व्यक्ति कुछ पैसे देने लग गया। राजवीर और उसके दोस्त पहले ही डॉक्टर का बिल चुकाने का मन बना चुके थे। सबने मिलकर बिल चुका दिया। मगर उस शहर के डॉक्टर में इतनी भी करुणा नहीं थी की वो कम से कम अपनी फ़ीस ही छोड़ देता, मरहम–पट्टी और दवा की बात तो और थी। राजवीर सोच रहा था क्या इसी को शहर कहते हैं - उसके भीतर विचारों का एक असीम सागर हिलोरें ले रहा था। विचारों की इसी उहा–पोह में कब उसकी टर्न आ गयी, उसे पता ही नहीं चला। डॉक्टर से बैठने का संकेत पाकर वो रोगी कुर्सी पर बैठ गया। डॉक्टर ने चैक–अप शुरू कर दिया था।


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