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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


पत्थर तोड़ती औरत

 चिलचिलाती धूप में
पत्थर तोड़ती वह प्रवासी औरत
उठाती है हथौड़े को
हर बार प्रचंड वेग से।

प्रहार करती है इस तरह
मानो
कर देना चाहती है
खंड-खंड
अपने जीवन की
विपत्तियों को भी।

कठोर परिश्रम से
वज्र हो चुका है उसका शरीर
मगर
सहेज रखा है उसने
एक कोमल व स्नेहिल
मातृ हृदय अपने भीतर।

माथे पर आई पसीने की बूँदों को
पोंछती है वह
और थोड़ी ही दूर
छाया में सुलाए शिशु को
देखती है नज़र भर।

सुरक्षित और
सुकून में पाकर उसे
तैर पड़ती है
एक हल्की सी मुस्कान
उसके चेहरे पर।

दुगनी ताकत और जोश से
उठाती है वह हथौड़ा इस बार
कर देने चूर-चूर
पाषाण के अभिमान को।


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