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ISSN 2292-9754

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05.25.2016


परिवर्तन

नन्ही सुजाता अब बड़ी हो गई थी। ऑफ़िस से लौटते हुए रिहायशी कॉलोनी के कैंपस में जैसे ही सिद्धार्थ की नज़र उस पर पड़ी तो उसने जैसे नज़रें ही मोड़ ली थीं। सिद्धार्थ को जैसे झटका सा लगा। उसे वो पुराने दिन याद आने लगे जब वो किताबें उठाये उसी ट्यूशन सेंटर में आती थी जहाँ पर वो ट्यूशन पढ़ाया करता था। जब कभी सुजाता के अध्यापक अवकाश पर होते थे तो वही उसको पढ़ाता था। सिद्धार्थ और सुजाता एक ही गाँव के थे। सुजाता उसकी 12 वर्ष छोटी चचेरी बहन की क्लास में पढ़ती थी, इसीलिए वह उसे भी हमेशा छोटी बहन की तरह ही समझता था। मिलते ही वह हाथ जोड़कर आदर स्वरूप "नमस्ते भैया" ज़रूर बोल देती थी।

जीवन के संघर्षों से झूझते हुए सिद्धार्थ ने रोज़गार की तलाश में गाँव छोड़ दिया। सुजाता की शादी सिद्धार्थ की कंपनी में काम करने वाले केशव से हुई थी जो कि सिद्धार्थ से पद में एक दर्जे ऊपर था। सुजाता भी पढ़ने में होशियार थी, उसने भी अभियांत्रिकी में स्नातक की डिग्री हासिल कर ली थी। वर्षों से घर से दूर शहर के कामकाजी माहौल में रहते हुए भी सिद्धार्थ को कभी अपने पद का गुमान नहीं रहा। वह हमेशा साधारण जीवन जीने में ही विश्वास रखता था।

उसके बाद भी कई बार आते–जाते उसका सामना सुजाता से हुआ, मगर वो हर बार उसे देख कर भी अनदेखा कर देती थी। आदर्शवादी सिद्धार्थ को हमेशा ही यह बात कचोटती रहती थी। मगर धीरे- धीरे उसे अब यह महसूस होने लगा था कि गुज़रते वक़्त के साथ सुजाता की सोच भी शायद आधुनिक और अति परिपक्व हो गई है। हो सकता है कि वह अपनेआप को गाँव के बजाय शहर का ही दिखाना चाहती हो या उसके बात न करने का कारण उसके पति की तथाकथित पद प्रतिष्ठा रही हो। उसके व्यवहार में आये इस परिवर्तन को स्वीकारने में ही अब सिद्धार्थ को समझदारी लगने लगी थी। मगर नन्ही सुजाता के बचपन की वह मासूम व निर्मल छवि अक्सर उसकी आँखों के सामने तैरने लग जाती थी।


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