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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


मेरे मार्गदर्शक - पिता और शब्दकोश

जिल्द में लिपटा
पिता का दिया शब्दकोश
अब हो गया है पुराना
ढल रही उसकी भी उम्र
वैसे ही
जैसे कि पिता के चेहरे पर
नज़र आने लगी हैं झुर्रियाँ
मगर डटे हैं मुस्तैदी से
दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर।

अटक जाता हूँ कभी
तो काम आता है आज भी
वही शब्दकोश
पलटता हूँ उसके पन्ने
पाते ही स्पर्श
उँगलियों के पोरों से
महसूस करता हूँ
कि साथ हैं पिता
थामे हुए मेरी ऊँगली
जीवन के मायनों को
समझाते हुए
राह दिखाते
एक प्रकाशपुंज की तरह।

ज़माने की कुटिल चालों से
क़दम-क़दम पर छले गए
स्वाभिमानी पिता
होते गए सख़्त बाहर से
वह छुपाते गए हमेशा ही
भीतर की भावुकता को।

ताकि मैं न बन जाऊँ
दब्बू और कमज़ोर
और दृढ़ता के साथ
कर सकूँ सामना
जीवन की हर चुनौती का।

उनमें आज भी दफ़न है
वही गुस्सा
ख़ुद के छले जाने का
जो कि फूट पड़ता है अक्सर
जिसे नहीं समझना चाहता
कोई भी।

सीमेंट और बजरी के स्पर्श से
बार-बार ज़ख़्मी होते
हाथों व पैरों की उँगलियों के
घावों से
रिसते लहू को
कपड़े के टुकड़ो से बाँधते
ढाँपते और छुपाते
उफ़ तक न करते हुए
कितनी ही बार,
पीते गए हलाहल
अनंत पीड़ा का।

संतानों का भविष्य
सँवारने की धुन में
संघर्षरत रहकर ता उम्र
खड़ा कर दिया है आज
बच्चों को अपने पाँवों पर।

अब चिंताग्रस्त नहीं हैं वे
आश्वस्त हैं
हम सबके लिए
मगर फिर भी
हर बार मना करने पर
चले जाते हैं काम पर आज भी
घर पर खाली रहना
कचोटता है
उनके स्वाभिमान को।

पिता आज बेशक़ रहते हैं
दूर गाँव में
मगर उनका दिया शब्दकोश
आज भी देता है सीख
और एक अहसास
हर पल
उनके साथ होने का।


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