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ISSN 2292-9754

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03.20.2016


मनचले

लॉन्ग रूट की बस सर्पीली पहाड़ी सड़क से गुज़र रही थी। कंडक्टर की सीटी के साथ ही बस सवारियों को चढ़ाने के लिए एकाएक रुकी। अन्य सवारियों के साथ दो किशोरियाँ भी बस में चढ़ीं। दो मनचले लड़के भी उनका पीछा करते बस में चढ़ गए थे। बस की सभी सीटों पर सवारियाँ बैठी थीं, इसीलिए दोनों लड़के बस की बीच वाली गैलरीनुमा जगह पर खड़े हो गए। दोनों किशोरियों को सीट पर बैठी सवारियों ने आगे–पीछे, जैसे–तैसे एडजस्ट करके बिठा दिया। एक मनचले ने आगे वाली सीट पर बैठी किशोरी के साथ बुदबुदाहट के साथ छेड़खानी शुरू कर दी और दूसरा मनचला पीछे वाली सीट पर बैठी किशोरी के साथ अपनी टाँग सटाकर खड़ा हो गया। यही क्रम काफ़ी देर तक चलता रहा। पीछे वाली किशोरी के सामने की सीट पर सिद्धांत अपनी 5 साल की बेटी और पत्नी के साथ बैठा था। किशोरी की नज़र सिद्धांत पर पड़ी तो वह लज्जा से झेंप सी गई थी। मानो, सहायता के लिए कहना चाहती हो मगर संकोचवश कह न पा रही हो।

बस में भीड़ ज़्यादा होने के कारण किसी का भी ध्यान उन मनचलों की हरकतों पर नहीं गया। सिद्धांत ने जैसे ही पीछे वाली किशोरी से कहा कि "अगर आपको बैठने में कोई परेशानी हो रही है तो आप मेरी सीट पर बैठ जाइये।" इससे पहले कि वह किशोरी कुछ प्रतिक्रिया देती, पीछे वाला मनचला सचेत हो गया। सिद्धांत ने उस मनचले को उग्र भावों के साथ घूर कर देखा तो उसके माथे पर बल पड़ने लगे। सहारे का अहसास पाकर, आगे बैठी किशोरी ने भी हिम्मत जुटाकर ऊँचे स्वर में विरोध कर दिया। सभी सवारियों की नज़र अब उन मनचलों पर थी। दो–तीन सवारियों ने उन्हें हड़का भी दिया था। ये देखकर दोनों मनचले पसीने-पसीने हो गए थे। उनकी टाँगों में पैदा हो चुकी कंपकपी से उनका बस में खड़ा रहना अब मुश्किल हो गया था। सवारियों को उतारने के लिए जैसे ही बस रुकी तो वो मनचले तेज़ी से बस से नीचे उतर गए।

दोनों किशोरियों के चेहरों पर अब मुस्कान तैर रही थी। शायद वे समझ चुकीं थी कि निडरता और आत्मविश्वास से हर मुसीबत का सामना किया जा सकता है। कुछ ही देर में उनका स्टॉपेज आ गया। उन्होंने निश्चल नेत्रों से सिद्धांत को एक नज़र देखा और धन्यवाद करते हुए बस से उतर गई। सिद्धांत ने भी मुस्कुरा कर संतोष की साँस ली। उसका सफ़र लम्बा था, इसीलिए उसने आँखे मूँद लीं थी। बस अब पुनः पहाड़ी सर्पीली सड़क पर निर्बाध दौड़ रही थी।


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